कारों से गायब हो रही स्टेपनी: नियम बदले, कंपनियों की रणनीति बदली, ग्राहक असमंजस में

नियम बदले, कंपनियों की रणनीति बदली, ग्राहक असमंजस में
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नई दिल्ली। भारत में ऑटोमोबाइल सेक्टर तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ कार कंपनियां सनरूफ, बड़े टचस्क्रीन और एडवांस सेफ्टी फीचर्स जोड़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा से जुड़ा एक अहम हिस्सा स्टेपनी यानी स्पेयर टायर धीरे धीरे कारों से गायब किया जा रहा है। मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स से लेकर कई लग्जरी ब्रांड्स अब अपनी नई कारों में स्टेपनी नहीं दे रहे हैं, जिससे ग्राहकों के बीच सवाल खड़े हो रहे हैं।

सरकार ने क्यों दी स्टेपनी से छूट

जुलाई 2020 में केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स में अहम संशोधन किया। इसके तहत M1 कैटेगरी के वाहनों को स्टेपनी रखने की अनिवार्यता से छूट दे दी गई। इस श्रेणी में वे वाहन आते हैं जिनमें ड्राइवर सहित अधिकतम 9 सीटें होती हैं और जिनका वजन 3.5 टन से कम होता है।

हालांकि यह छूट शर्तों के साथ दी गई है। ऐसे वाहनों में ट्यूबलेस टायर, टायर प्रेशर मॉनिटरिंग सिस्टम और टायर रिपेयर किट का होना जरूरी है, जिसमें एयर इन्फ्लेटर और सीलेंट शामिल हों।

क्यों हटाई जा रही है स्टेपनी

कार कंपनियों का कहना है कि स्टेपनी और उससे जुड़े औजारों का वजन करीब 15 से 20 किलो तक होता है। इसे हटाने से वाहन हल्का होता है, जिससे माइलेज बेहतर होता है। इसके अलावा स्पेयर टायर न होने से बूट स्पेस बढ़ जाता है, जो ग्राहकों को ज्यादा लगेज रखने में मदद करता है।

हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों में बैटरी पैक के लिए ज्यादा जगह की जरूरत होती है। ऐसे में कंपनियां स्टेपनी की जगह बैटरी और अन्य तकनीकी उपकरण फिट कर रही हैं। साथ ही टायर टेक्नोलॉजी में सुधार और बेहतर सड़कों के चलते कंपनियों का दावा है कि टायर पंचर की समस्या पहले के मुकाबले कम हुई है।

लागत घटाने का भी खेल

स्टेपनी हटाकर कंपनियां अपनी लागत भी कम कर रही हैं। इससे वे उसी कीमत में अन्य लग्जरी और स्मार्ट फीचर्स जोड़ पा रही हैं, जो आज के बाजार में ग्राहकों को आकर्षित करते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण और हाईवे इलाकों में स्टेपनी का न होना अभी भी जोखिम भरा साबित हो सकता है।

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