अशुद्ध पेयजल बना जानलेवा संकट, हर साल डायरिया से चार लाख मौतें

देश में साफ और सुरक्षित पेयजल की कमी अब एक गंभीर जनस्वास्थ्य संकट का रूप ले चुकी है। उपलब्ध आंकड़ों और विशेषज्ञों के आकलन के अनुसार हर वर्ष अशुद्ध पानी के सेवन से डायरिया जैसी बीमारियों के कारण करीब चार लाख लोगों की जान चली जाती है। इसके अलावा लगभग एक करोड़ लोग किसी न किसी रूप में दिव्यांगता, कुपोषण या गंभीर जलजनित रोगों से प्रभावित हो रहे हैं। यह स्थिति बताती है कि स्वच्छ जल तक पहुंच अभी भी देश की बड़ी आबादी के लिए सपना बनी हुई है।
केंद्र सरकार की अमृत योजना और जल जीवन मिशन जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं का उद्देश्य हर घर तक साफ पानी पहुंचाना है, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका असर अपेक्षा के अनुरूप नजर नहीं आ रहा। कई राज्यों में योजनाओं के क्रियान्वयन में सुस्ती, तकनीकी खामियां और कमजोर निगरानी व्यवस्था के कारण पाइपलाइन से मिलने वाला पानी भी दूषित पाया जा रहा है। कहीं पानी की नियमित जांच नहीं हो रही, तो कहीं पुरानी और जर्जर जलापूर्ति व्यवस्था संक्रमण का कारण बन रही है।
शहरी क्षेत्रों की स्थिति भी चिंताजनक है। हाल ही में इंदौर जैसे विकसित माने जाने वाले शहर में अशुद्ध पानी के कारण हुई मौतों ने यह साफ कर दिया कि केवल बड़े शहर होना सुरक्षित जल की गारंटी नहीं है। कई इलाकों में सीवरेज और पेयजल लाइनों का आपस में मिल जाना, टैंकरों से सप्लाई होने वाला बिना जांच का पानी और भूमिगत जल का बढ़ता प्रदूषण लोगों की सेहत पर सीधा असर डाल रहा है।
ग्रामीण इलाकों में हालात और भी गंभीर हैं। अनेक गांवों में लोग आज भी कुएं, तालाब या हैंडपंप के दूषित पानी पर निर्भर हैं। बरसात के मौसम में जल स्रोतों में गंदगी मिलने से बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। बच्चों और बुजुर्गों में डायरिया, हैजा और टाइफाइड जैसी बीमारियां तेजी से फैलती हैं, जिससे मृत्यु दर बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट केवल पानी की कमी का नहीं, बल्कि गुणवत्ता का भी है। जब तक जल की नियमित जांच, पारदर्शी निगरानी और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही तय नहीं की जाती, तब तक योजनाएं कागजों तक ही सीमित रहेंगी। सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करना केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास की मांग करता है, ताकि हर नागरिक को बीमारी नहीं, बल्कि जीवन देने वाला पानी मिल सके।
