खेतों में महकने लगी 'काले सोने' की खुशबू:: भीलवाड़ा में अफीम की फसल पर खिले सफेद फूल, किसानों ने शुरू किया रात का पहरा

भीलवाड़ा में अफीम की फसल पर खिले सफेद फूल, किसानों ने शुरू किया रात का पहरा
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​भीलवाड़ा हलचल ।​मेवाड़ की माटी में इन दिनों 'काले सोने' यानी अफीम की फसल लहलहा रही है। भीलवाड़ा जिले के अफीम उत्पादक क्षेत्रों में पौधों पर आए सफेद फूलों ने किसानों के चेहरों पर चमक तो ला दी है, लेकिन साथ ही उनकी रातों की नींद भी उड़ा दी है। अफीम एक ऐसी फसल है जिसे पालना किसी नवजात शिशु की देखभाल करने जैसा चुनौतीपूर्ण है।

​मौसम का मिजाज और फसल की रंगत

​कृषि विशेषज्ञों और अनुभवी किसानों के अनुसार, वर्तमान में पड़ रही सुबह की हल्की ठंड और दोपहर की गुनगुनी धूप अफीम के पौधों के लिए 'अमृत' के समान है। इस अनुकूल मौसम के कारण पौधों की बढ़त अच्छी है और उन पर सफेद फूल खिलने लगे हैं। फूलों के गिरने के बाद डोडों का आकार बनेगा, जो फसल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।

​खेतों के चारों ओर लोहे का कवच और 'अस्थायी घर'

​अफीम की सुरक्षा के लिए किसान कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं:

​वन्यजीवों का डर: जंगली सूअर और नीलगाय (रोजड़े) फसल को भारी नुकसान पहुँचाते हैं। इससे बचने के लिए किसानों ने खेतों के चारों ओर लोहे की मजबूत जालियां और कंटीले तार लगा दिए हैं।

​असामाजिक तत्वों की नजर: अफीम कीमती होने के कारण चोरी का डर बना रहता है।

​रात का पहरा: आने वाले दिनों में जब डोडों पर चीरा लगाने का समय आएगा, किसान खेतों में ही अस्थायी झोपड़ियां बनाकर रहेंगे। रात भर अलाव जलाकर फसल की रखवाली करना अब किसानों की दिनचर्या का हिस्सा बन जाएगा।

​लाइसेंस बचाने की जद्दोजहद

​अफीम की खेती के साथ कड़े नियम जुड़े हुए हैं। यदि खेत से अफीम चोरी हो जाती है या पैदावार सरकार द्वारा तय औसत (Yield) से कम रहती है, तो नारकोटिक्स विभाग किसान का लाइसेंस रद्द कर सकता है। एक बार लाइसेंस कटने का मतलब है कि किसान भविष्य में कभी इस बेशकीमती फसल को नहीं उगा पाएगा। यही कारण है कि किसान इसे कमाई से ज्यादा अपनी 'जिम्मेदारी' और 'इज्जत' मानकर संभालते हैं।

​नई अफीम नीति 2025-26: किसानों को मिली संजीवनी

​केंद्र सरकार द्वारा घोषित वर्ष 2025-26 की अफीम नीति ने भीलवाड़ा सहित चित्तौड़गढ़ और प्रतापगढ़ के किसानों को बड़ी राहत दी है:

​CPS पद्धति में सुधार: नई नीति के तहत उन किसानों को विशेष लाभ मिला है जो सीपीएस (Centralized Processing of Straw) पद्धति के तहत खेती कर रहे थे।

​लाइसेंस बहाली: कई पुराने कटे हुए लाइसेंस बहाल होने और नियमों में सरलता आने से किसानों में उत्साह है। नई नीति ने उत्पादन मानकों को थोड़ा व्यावहारिक बनाया है, जिससे किसानों पर दबाव कम हुआ है।

​मार्च का इंतजार: जब डोडों पर लगेगा 'चीरा'

​फसल का असली इम्तिहान मार्च महीने में होगा। जब डोडों पर चीरा लगाया जाएगा, तब उनसे निकलने वाला दूध (Lactex) रात भर में जम जाएगा, जिसे सुबह इकट्ठा किया जाएगा। यह समय सबसे अधिक संवेदनशीलता का होता है, क्योंकि ओलावृष्टि या बेमौसम बारिश पूरी मेहनत को मिट्टी में मिला सकती है।

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