ज़हर की थाली: मुनाफे की भूख ने इंसानी नसों में घोला 'एंटीबायोटिक', बेअसर हो रही दवाइयां


भीलवाड़ा। क्या आप जानते हैं कि जिस दूध को आप अमृत समझकर पी रहे हैं या जिन हरी सब्जियों से सेहत बनाने की उम्मीद कर रहे हैं, वो असल में धीमी मौत का सामान साबित हो सकती हैं? भीलवाड़ा सहित देश भर में डेयरी, पोल्ट्री और खेती के नाम पर 'एंटीबायोटिक' का जो नंगा नाच चल रहा है, उसने इंसानी शरीर को बीमारियों का घर बना दिया है। हालत यह है कि अब इंसानों पर सामान्य दवाइयां बेअसर हो रही हैं, क्योंकि हम अनजाने में रोज़ाना फसलों और मांस-दूध के जरिए एंटीबायोटिक का ओवरडोज ले रहे हैं।

खेतों में 'कैंसर' की खेती: छिड़काव आज, मंडी में कल

मुनाफे के लालची सिस्टम ने खेती को ज़हरीला बना दिया है। सब्जियों और फसलों को फंगस व बैक्टीरिया से बचाने के नाम पर किसान अंधाधुंध एंटीबायोटिक और हैवी इंसेक्टिसाइड का छिड़काव कर रहे हैं। नियम कहता है कि दवा छिड़कने के कम से कम 10 दिन बाद तक फसल नहीं काटनी चाहिए, लेकिन चंद रुपयों के लिए अगले ही दिन सब्जियां तोड़कर मंडी पहुंचा दी जाती हैं। लाल और पीले निशान वाले घातक रसायनों का यह अंश जब आपके पेट में जाता है, तो उल्टी, मितली और पेट दर्द तो बस शुरुआत है; यह लंबे समय में आपके इंटरनल अंगों को खोखला कर रहा है।

दूध के नाम पर 'सफेद ज़हर' का कारोबार

डेयरी सेक्टर में तो स्थिति और भी भयावह है। पशु बीमार हो तो उसे एंटीबायोटिक देना मजबूरी हो सकता है, लेकिन नियम है कि इंजेक्शन के बाद 72 घंटे तक उस पशु का दूध नहीं बेचना चाहिए। मगर हकीकत यह है कि इंजेक्शन लगने के कुछ ही घंटों बाद उस पशु का दूध निकालकर सीधे आपकी रसोई तक पहुंचा दिया जाता है। झोलाछाप गौ-सेवक और पशुपालक पशुओं को सीधे 'हायर जनरेशन' के एंटीबायोटिक ठोक रहे हैं। नतीजा? वही एंटीबायोटिक दूध और अंडों के जरिए आपके खून में मिल रहा है।

सुपरबग का खतरा: जब दवा काम करना बंद कर दे

चिकित्सकों के लिए सबसे डरावनी बात यह है कि अब पशुओं और इंसानों दोनों में 'एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस' (दवा प्रतिरोध) विकसित हो गया है। पशु चिकित्सकों के पास आने वाले 50% मामलों में सामान्य एंटीबायोटिक काम ही नहीं कर रहे। इंसानों का भी यही हाल है; जो बीमारी कभी एक गोली से ठीक हो जाती थी, उसके लिए अब अस्पताल में भर्ती होकर भारी-भरकम इंजेक्शन लगवाने पड़ रहे हैं। हम एक ऐसे दौर की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ मामूली ज़ख्म भी जानलेवा हो सकता है क्योंकि शरीर पर कोई दवा असर ही नहीं करेगी।

प्रशासनिक लापरवाही या सामूहिक आत्महत्या?

पशुपालन विभाग और कृषि विभाग केवल कागजी सलाह जारी कर पल्ला झाड़ लेते हैं। मंडियों में सब्जियों की रैंडम चेकिंग नहीं होती और न ही दूध की गुणवत्ता में एंटीबायोटिक के अंश की जांच की जाती है। जब तक प्राकृतिक और जैविक खेती को कड़ाई से लागू नहीं किया गया और एंटीबायोटिक की बिक्री पर लगाम नहीं लगी, तब तक आपकी 'सेहतमंद डाइट' महज़ एक भ्रम बनी रहेगी।

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