मुफ्तखोरी' पर सुप्रीम कोर्ट की स्ट्राइक!: क्या राजस्थान में 'रेवड़ियों' पर लगेगा ताला?

भीलवाड़ा। राजनीति में 'वोट के बदले नोट' की पुरानी परंपरा अब सरकारी योजनाओं का चोला ओढ़ चुकी है। लेकिन अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने इस 'मुफ्तखोरी' (Freebies) की संस्कृति पर कड़े सवाल उठाकर राजस्थान समेत कई राज्यों की नींद उड़ा दी है। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने उन सरकारों के पसीने छुड़ा दिए हैं जो बजट का एक बड़ा हिस्सा विकास कार्यों के बजाय सीधे नकद बांटने और लोकलुभावन घोषणाओं में झोंक रही हैं।
राजस्थान: खजाने पर भारी पड़ती 'चुनावी' सौगातें
राजस्थान में पिछली सरकार के समय से शुरू हुआ 'कैश और काइंड' (नकद और वस्तु) का सिलसिला वर्तमान में भी चुनौती बना हुआ है। प्रदेश के वित्तीय प्रबंधन की कमर तोड़ने वाली प्रमुख योजनाएं और उनके लाभ कुछ इस प्रकार हैं:
नकद हस्तांतरण और सब्सिडी: अन्नपूर्णा राशन किट से लेकर मुख्यमंत्री गैस सिलेंडर योजना (करीब ₹450 में सिलेंडर) तक, सरकार बाजार दर और रियायती दर के बीच के भारी अंतर को खुद वहन कर रही है। यह अंतर करोड़ों रुपये के अतिरिक्त भार के रूप में बजट को खोखला कर रहा है।
बिजली का 'करंट': घरेलू उपभोक्ताओं को 100 यूनिट और किसानों को 2000 यूनिट मुफ्त बिजली देने के कारण विद्युत कंपनियों (डिस्कॉम) की हालत पहले से ही खस्ता है। सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी का पैसा सीधे जनता की जेब से टैक्स के रूप में वापस वसूला जा रहा है।
* स्कूटी, लैपटॉप और साइकिल: मेधावी छात्रों को स्कूटी, लैपटॉप और साइकिल बांटने जैसी योजनाएं सुनने में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन जानकारों का मानना है कि बुनियादी शिक्षा के ढांचे को सुधारने के बजाय इन 'उपहारों' पर व्यय होने वाली राशि दीर्घकालिक विकास को बाधित कर रही है।
मध्य प्रदेश और बिहार का उदाहरण: वोट बैंक की राजनीति
सिर्फ राजस्थान ही नहीं, पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश में 'लाड़ली बहना योजना' के लिए वित्तीय वर्ष 2026-27 में 23 हजार करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया गया है। यह राज्य के कुल बजट का लगभग 7% हिस्सा है। वहीं बिहार में भी चुनाव जीतने के लिए नकद हस्तांतरण योजनाओं का सहारा लिया गया, जिसने मतदाताओं को प्रभावित तो किया लेकिन राज्यों के ऋण (Debt) के जाल को और गहरा कर दिया।
बजट का बढ़ता बोझ और कोर्ट की चिंता
जैसे-जैसे बजट का आकार बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इन योजनाओं का ब्याज और वित्तीय घाटा भी बढ़ता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिए जनता के पैसे का इस्तेमाल मुफ्तखोरी में कर रहे हैं, जिससे अंततः देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है। अब सवाल यह है कि क्या राजस्थान सरकार अपनी इन योजनाओं को तर्कसंगत बनाएगी या कोर्ट की सख्ती का इंतजार करेगी?
भीलवाड़ा हलचल न्यूज पोर्टल पर अपनी खबर देने के लिए संपर्क करें:
समाचार: प्रेम कुमार गढवाल 9413376078 (Email: [email protected], व्हाट्सएप: 9829041455)
विज्ञापन: विजय गढवाल 6377364129
संपर्क कार्यालय: भीलवाड़ा हलचल, कलेक्ट्री रोड, नई शाम की सब्जी मंडी, भीलवाड़ा फोन: 7737741455.
