महंगा हुआ 'स्वर्ण' और 'रजत':: अब आयुर्वेद से सेहत सुधारना भी हुआ मुश्किल, दवाओं के दाम 40% तक बढ़े


​आयुर्वेद में जिन धातुओं को 'नोबल मैटल' यानी सबसे श्रेष्ठ माना गया है, उनकी बढ़ती कीमतें अब मरीजों के लिए सिरदर्द बन गई हैं। सोने और चांदी के भाव में रिकॉर्ड तेजी के कारण आयुर्वेदिक दवाओं, भस्मों और च्यवनप्राश की कीमतों में 10 से 40 फीसदी तक का उछाल आया है।

​दवाओं पर दोहरा संकट: असर सीधा भी और इनडायरेक्ट भी

​जानकारों के मुताबिक, धातुओं की महंगाई का असर दो तरह से पड़ रहा है:

​महंगी दवाइयां: स्वर्ण भस्म और रजत भस्म से बनने वाली दवाएं अब सामान्य मरीज की पहुंच से बाहर हो रही हैं।

​गुणवत्ता से समझौता: कीमतें बढ़ने के कारण दवा कंपनियां महंगे इंग्रीडिएंट्स (सामग्री) का इस्तेमाल कम कर सकती हैं, जिससे दवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होने का डर है। डॉक्टर भी अब महंगी दवाइयां लिखने से परहेज कर रहे हैं।

​कहां-कहां होता है इन 'महंगी धातुओं' का उपयोग?

​आयुर्वेद और चिकित्सा जगत में सोना-चांदी केवल सजावट की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन रक्षक आधार हैं:

​सोना (स्वर्ण): इसे बेहतरीन इम्यूनिटी बूस्टर माना जाता है। कमजोरी दूर करने, सांस रोग और डायबिटीज की 50 से अधिक दवाओं में इसका उपयोग होता है।

​चांदी (रजत): यह ब्रेन फंक्शन को सुधारने और बैक्टीरिया से लड़ने में कारगर है। गंभीर संक्रमण, जलने के घाव की क्रीम और यूरीनरी इंफेक्शन की दवाओं में इसका इस्तेमाल अनिवार्य है।

​दंत चिकित्सा: दांतों की कैविटी भरने वाले सिल्वर अलॉय पाउडर (60 ग्राम) की कीमत अब 5 हजार रुपये के पार पहुँच गई है।

​विशेषज्ञों के अनुसार, राजस्थान में आयुर्वेदिक दवाओं का सालाना टर्नओवर करीब 150 करोड़ रुपये का है। सोने-चांदी के दाम बढ़ने से इस पूरे मार्केट पर असर पड़ा है। विशेषकर सर्दियों में इस्तेमाल होने वाले च्यवनप्राश और इम्यूनिटी बढ़ाने वाली दवाओं के शौकीन अब अपनी जेब ढीली करने को मजबूर हैं।


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