कहां और कैसे बचे भीलवाड़ा ? छूटा पशु मार देता है, कुत्ता नोंच लेता है सड़के जख्म दे रही हे और तंत्र झुठला देता है

भीलवाड़ा। 'वस्त्र नगरी' के नाम से मशहूर हमारा भीलवाड़ा आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। शहर का आम नागरिक आज खुद को लाचार महसूस कर रहा है, क्योंकि यहाँ सुरक्षा और सुविधा के नाम पर केवल 'सिस्टम की बेरुखी' हाथ लगती है।
शहर के तीन बड़े जख्म: जिन पर प्रशासन मौन है
खूनी संघर्ष और आवारा पशु: शहर की मुख्य सड़कों से लेकर तंग गलियों तक, सांडों और लावारिस मवेशियों का जमावड़ा है। आए दिन ये पशु राहगीरों को अपनी चपेट में ले रहे हैं। कई मासूम अपनी जान गंवा चुके हैं और कई अपाहिज हो गए, लेकिन नगर परिषद का 'कांजी हाउस' केवल कागजों तक सीमित है।
कुत्तों का आतंक: शहर के हर मोहल्ले में आवारा कुत्तों का झुंड है। छोटे बच्चों का घर से बाहर निकलना दूभर हो गया है। आए दिन 'डॉग बाइट' के मामले सामने आते हैं, मगर नसबंदी और धरपकड़ का अभियान फाइलों में दबा हुआ है।
सड़कें या मौत के गड्ढे: भीलवाड़ा की सड़कें अब चलने लायक नहीं रहीं। गड्ढों की वजह से लोगों की कमर टूट रही है और वाहन कबाड़ हो रहे हैं। धूल और धक्कों के बीच जनता पिस रही है, लेकिन जिम्मेदारों का तंत्र इसे सुधारने के बजाय आंकड़ों की बाजीगरी में जुटा है।
तंत्र की चुप्पी और जनता का दर्द
जब भी कोई बड़ी घटना होती है, प्रशासन जागने का नाटक करता है, लेकिन कुछ दिन बाद स्थिति जस की तस हो जाती है। जनता टैक्स भर रही है, लेकिन बदले में उसे क्या मिल रहा है? असुरक्षित सड़कें, खूंखार कुत्ते और जानलेवा मवेशी। आखिर कब तक भीलवाड़ा का आम आदमी इस 'सिस्टम की विफलता' का बोझ उठाएगा?
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