भीलवाड़ा में गो-संरक्षण के नाम पर 'करोड़ों का खेल': सड़कों पर मौत बनकर दौड़ रहा गोवंश

भीलवाड़ा में गो-संरक्षण के नाम पर करोड़ों का खेल: सड़कों पर मौत बनकर दौड़ रहा गोवंश
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भीलवाड़ा। वस्त्र नगरी भीलवाड़ा में गो-संरक्षण के नाम पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये बहाए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। जिले की सड़कों पर आवारा गोवंश आज भी पूर्व की भांति विचरण कर रहा है, जो न केवल खुद के लिए बल्कि राहगीरों के लिए भी 'मौत का सबब' बनता जा रहा है।

आंकड़े दे रहे जमीनी सच्चाई को तमाचा

अनुमान के मुताबिक, पिछले चार सालों में जिले में गोवंश संरक्षण पर करोड़ो रुपये खर्च किए जा चुके हैं। अकेले एक साल में ही प्रशासनिक स्तर पर रखरखाव और भरण-पोषण के नाम पर बड़े खर्च दिखाए जा रहे हैं। विभाग का दावा है कि लक्ष्य से अधिक पशु गो-संरक्षण केंद्रों में सुरक्षित हैं, लेकिन शहर की सड़कों और गांवों के खेतों में घूमते हजारों मवेशी इन 'सुनहरे आंकड़ों' की पोल खोल रहे हैं। यह स्थिति भ्रष्टाचार और प्रशासनिक निर्लज्जता का जीता-जागता प्रमाण है।असलियत यह है कि पशु पूरी तरह छुट्टा हैं, जो रात के समय सड़कों पर बैठते हैं या किसानों की फसलें चट कर रहे हैं।

सड़कों पर दुर्घटनाएं और किसानों की बर्बादी

बेसहारा गोवंश की वजह से भीलवाड़ा के राजमार्गों और शहर की तंग गलियों में आए दिन भीषण दुर्घटनाएं हो रही हैं। रात के अंधेरे में ये पशु वाहन चालकों के लिए काल बन रहे हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अपनी फसलों को बचाने के लिए कड़कड़ाती ठंड में रात-भर पहरा देने को मजबूर हैं। तारबंदी का अतिरिक्त बोझ भी किसानों की कमर तोड़ रहा है।

डीएम साहब से जवाबदेही की मांग

जिले के जागरूक नागरिकों ने अब जिला कलेक्टर से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। सवाल यह है कि यदि बजट पूरा खर्च हो रहा है , तो फिर सड़कों पर ये पशु कहां से आ रहे हैं? क्या यह करोड़ों का बजट प्रशासनिक मिलीभगत से 'हजम' किया जा रहा है? जिले की जनता अब इन 'रेत के महलों' जैसे आंकड़ों के बजाय धरातल पर समाधान चाहती है।

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