पत्थरों के बीच जिंदगी से जूझता ‘तेजस्व’ — समाज से संवेदनशीलता की पुकार

पत्थरों के बीच जिंदगी से जूझता ‘तेजस्व’ — समाज से संवेदनशीलता की पुकार
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भीलवाड़ा।** पत्थरों के बीच मिला एक मासूम आज महात्मा गांधी अस्पताल के एनआईसीयू वार्ड में जिंदगी और मौत से संघर्ष कर रहा है। उसके छोटे से शरीर पर क्रूरता के ऐसे निशान हैं, जिन्हें देखकर हर किसी की रूह कांप उठती है। बाल कल्याण समिति ने इस नन्हे शिशु का नाम *‘तेजस्व’* रखा है— ताकि यह बच्चा अंधेरे से लड़ते हुए जीवन की रोशनी पा सके।

पुलिस की शुरुआती जांच ने दिल दहला देने वाला सच उजागर किया है। मासूम को पहले बेचने की कोशिश की गई, और जब यह प्रयास असफल रहा तो उसे पत्थरों के बीच फेंक दिया गया। इतना ही नहीं, रोने की आवाज बाहर न आए, इसके लिए उसके मुंह में पत्थर ठूंसकर फेविक्विक लगा दी गई। आरोपी लड़की और उसके पिता समेत तीन लोगों को पुलिस ने डिटेन किया है।

आशा की किरण

शिशु रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. इंदिरा सिंह चौहान बताती हैं कि 72 घंटे बच्चे के जीवन के लिए सबसे अहम हैं। फिलहाल सांस लेने में आ रही दिक्कत कुछ कम हुई है। डॉक्टरों का कहना है कि घाव भरने में 15 दिन का समय लगेगा। हर दिन, हर पल यह बच्चा नई उम्मीद जगा रहा है।

मानवता की कसौटी पर समाज

यह घटना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता की भी परीक्षा है। ऐसे हालात में जरूरत है कि हम सब मिलकर ‘तेजस्व’ जैसे मासूमों के लिए न केवल दुआ करें बल्कि ऐसा माहौल बनाएं जहां किसी मां-बाप को मजबूरी या भय के कारण अपने ही बच्चे के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार न करना पड़े।


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