खाकी की नाक के नीचे 'कातिल' का कारोबार:: भीलवाड़ा में तंत्र फेल, धड़ल्ले से बिक रही 'मौत की डोर'

भीलवाड़ा हलचल।
मकर संक्रांति के उल्लास पर इस बार फिर 'चाइनीज मांझे' का साया है। प्रशासन के खोखले दावों और प्रतिबंध के आदेशों को ठेंगा दिखाते हुए शहर की गलियों में मौत का सामान खुलेआम बिक रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि जिस खुफिया तंत्र और 'बीट सिस्टम' पर सुरक्षा का जिम्मा है, वह गहरी नींद में सोया है। नतीजतन, शाम की सब्जी मंडी से लेकर छिपा बिल्डिंग के पीछे ओर सिंधुनगर तक, 'कातिल मांझा' चोरी-छिपे हर दुकान तक पहुंच चुका है।
पुलिस का खुफिया तंत्र या 'मूक दर्शक'?
सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों का मानना है कि यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि खुफिया तंत्र की पूर्ण विफलता है। जब हर मोहल्ले में बीट कांस्टेबल तैनात है, तो उसे यह खबर क्यों नहीं कि अवैध सप्लाई कहां से हो रही है? पुलिस की कार्रवाई केवल मकर संक्रांति के दिन सड़क पर उतरने तक सीमित रह गई है। आखिर इस अवैध कारोबार की 'सप्लाई चेन' पर चोट करने से खाकी क्यों कतरा रही है? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद ही अपनी कुंभकर्णी नींद से जागेगा?
धागा नहीं, यह 'आरी' है
वैज्ञानिक रूप से यह मांझा नहीं, बल्कि नायलॉन और सिंथेटिक धागे पर कांच, मेटल पाउडर, एल्युमिनियम ऑक्साइड और लेड का घातक मिश्रण है। यह इतना सख्त है कि खींचने पर टूटता नहीं, बल्कि मांस को किसी आरी की तरह चीर देता है।
ब्लेड से तेज: इसकी धार सर्जिकल ब्लेड को मात देती है।
गला काटने में सक्षम: दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह चलते-फिरते फंदे जैसा है।
पक्षियों का काल: आसमान में उड़ते बेजुबान पक्षियों के पंख काटने में इसे चंद सेकंड लगते हैं।
कहाँ है सख्ती?
शहर के प्रमुख व्यापारिक क्षेत्रों और छोटी दुकानों पर प्रतिबंध के बावजूद दुकानदार अधिक मुनाफे के लालच में लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। सवाल यह है कि जब माल की आवक बाहरी राज्यों से हो रही है, तो सीमाओं पर चेकिंग क्यों नहीं हुई? शहर के भीतर गोदामों पर छापेमारी क्यों नहीं की गई?
अगर वक्त रहते इन 'मौत के सौदागरों' पर नकेल नहीं कसी गई, तो इस बार की संक्रांति भी किसी परिवार के आंगन में मातम का कारण बन सकती है। प्रशासन को 'कागजी प्रतिबंध' से बाहर निकलकर 'धरातल पर प्रहार' करने की जरूरत है।
