जान दे देंगे, पर बजरी नहीं ले जाने देंगे": ​चंद्रभागा नदी बचाने के लिए खजुरिया की महिलाओं ने संभाला मोर्चा, नदी के बीचों-बीच शुरू किया धरना

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​पोटलां (प्रहलाद तेली)। उपतहसील क्षेत्र के खजुरिया गांव में इन दिनों जल और जमीन बचाने की एक अनूठी जंग देखने को मिल रही है। चंद्रभागा नदी को बजरी खनन की लीज से मुक्त कराने के लिए गांव की लगभग पांच दर्जन महिलाएं नदी के बीचों-बीच धरने पर बैठ गई हैं। महिलाओं का जज्बा ऐसा है कि उन्होंने प्रशासन को दो टूक कह दिया है— "जब तक बजरी दोहन पर स्थाई रोक नहीं लगेगी, हम पीछे नहीं हटेंगे।"

​"हम सबका एक ही नाम— चंद्रभागा"

​धरने पर बैठी महिलाओं ने सामूहिक रूप से एक अनोखी घोषणा की है। उन्होंने कहा कि आज से उनका केवल एक ही नाम है— 'चंद्रभागा'। उन्होंने प्रशासन को स्पष्ट किया कि वे किसी के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी स्वेच्छा से इस पवित्र नदी के अस्तित्व को बचाने के लिए मैदान में उतरी हैं। पूर्व में भी ग्रामीणों ने 6 दिनों तक आंदोलन किया था, लेकिन अब महिलाएं आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं।

​क्यों हो रहा है विरोध? (प्रमुख कारण):

​जलस्तर गिरने का डर: ग्रामीणों का कहना है कि इसी नदी के कारण क्षेत्र के निजी कुओं और प्रसिद्ध खजुरिया बावजी मंदिर के कुएं का जलस्तर बना रहता है। बजरी निकलने से ये स्रोत सूख जाएंगे।

​खेती पर संकट: पिछले 52 वर्षों से नदी में बहाव कम हुआ है, ऐसे में किसान वर्ग पूरी तरह कुओं पर आश्रित है। बजरी दोहन से सिंचाई व्यवस्था ठप हो सकती है।

​आस्था का केंद्र: खजुरिया बावजी मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी पानी की व्यवस्था इसी भूजल स्रोत से जुड़ी है।

​"जान दे देंगे, पर बजरी नहीं ले जाने देंगे"

​महिलाओं ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि पूर्व में प्रशासन के दबाव में ग्रामीणों ने अपना धरना समाप्त कर दिया था, लेकिन अब महिलाएं एकजुट होकर अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार हैं। उन्होंने मांग की है कि ठेकेदार खजुरिया गांव की सीमा को छोड़कर कहीं और से दोहन करे, लेकिन इस क्षेत्र की 'चंद्रभागा मां' को नुकसान न पहुंचाए।

​खबर लिखे जाने तक महिलाएं अपनी मांग पर अडिग होकर नदी के पेटे में डटी हुई हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन इन महिलाओं की आवाज पर क्या रुख अपनाता है।


नदी संरक्षण और ग्रामीणों के संघर्ष की हर अपडेट के लिए पढ़ते रहिये: भीलवाड़ा हलचल

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