‘धर्म से बढ़कर कर्म का आधार होना चाहिए’

‘धर्म से बढ़कर कर्म का आधार होना चाहिए’
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भीलवाड़ा। जिला साहित्यकार परिषद् भीलवाड़ा की नव वर्ष की प्रथम काव्य गोष्ठी सिन्धुनगर स्थित हेमू कालाणी सिन्धी शिक्षण संस्था परिसर में आयोजित की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता दयाराम मेठानी ने की और संचालन महेन्द्र शर्मा ने किया। गोष्ठी में नव वर्ष, गणतंत्र दिवस, देशभक्ति, श्रृंगार रस और राजस्थानी भाषा में सुंदर रचनाओं का प्रस्तुतीकरण किया गया।

गोष्ठी का आरंभ सरस्वती वंदना से हुआ। सबसे पहले दीक्षा पंचोली ने ‘वो रात क्यों आई जो दिल को हिला गई’ प्रस्तुत की। इसके बाद राजेश मित्तल ने ‘तुमको हँस कर दिखला देंगे इतने भी कमजोर नहीं हैं’, श्रीमती प्रेम सोनी ने ‘संविधान लोकतंत्र की धड़कन है’, बंसीलाल पारस ने ‘वक्त की रेत मेरी मुट्ठी से फिसल रही’, चित्रा भाटिया ने ‘बहुत शोर है मेरे मन में पर खामोश बहुत हूँ’, शिखा बाहेती ने ‘दे दिया स्वाधीनता का हमे उपहार तुमने’, गायत्री सरगम ने ‘उन्हें प्यार नहीं हमसे इतना तो समझते हैं’, गोपाल शर्मा ने ‘कारवां चलता रहे, ज़िन्दगी चलती रहे’, डॉ. अवधेश जौहरी ने ‘मेरी खामोशियां कभी किसी से कुछ नहीं कहती’, दिनेश दीवाना ने ‘आधी रात को जब नींद उड़ जाए उस वक्त तेरी याद सताए’, ओम उज्जवल ने राजस्थानी में ‘गुजरिया गंगा जी मत जा, गंगाजी खुद आवेगी थारे ठाणे’, और जयप्रकाश भाटिया ने राजस्थानी में ‘रैवे क्यों रे म्हासे तणी तणी, बाली रे लागे म्हने घणी’ सुनाकर सभी का मन मोह लिया।

महेंद्र शर्मा ने कहा, “राष्ट्र धर्म सबसे ऊपर है और वंदे मातरम गा न सको तो स्वागत गान व्यर्थ है।” दयाराम मेठानी ने कहा, “देश से हर आदमी को प्यार होना चाहिए, धर्म से बढ़कर कर्म का आधार होना चाहिए।” उनके विचारों पर सभी ने तालियों से सहमति जताई।

काव्य गोष्ठी में डॉ. हरिओम पंचैली, दिव्या ओबेराय, अपेक्षा व्यास, श्याम सुंदर तिवारी और बृजसुंदर सोनी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रशंसा बटोरी और कार्यक्रम को सफल बनाया।

साहित्य और देशभक्ति की इस शाम ने उपस्थित जनों के हृदय में भावनाओं की गहराई और सामाजिक चेतना का संचार किया।

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