फागुन की मस्ती: 'बुरा न मानो होली है' के रंग में रंगा भीलवाड़ा

भीलवाड़ा। फागुन का महीना चढ़ते ही हवाओं में अबीर-गुलाल की महक और मन में उमंग की लहरें उठने लगी हैं। होली का त्यौहार केवल रंगों का मिलन नहीं, बल्कि खुशियों की एक ऐसी 'बोली' है जिसे हर दिल समझता है। गलियों में गूँजती 'होली है भई, होली है!' की आवाज़ें और युवाओं की टोलियां बता रही हैं कि त्यौहार का खुमार चढ़ने लगा है।
इस बार भी होली की वही पारंपरिक छटा देखने को मिल रही है, जहाँ कहीं भांग की गोली की मस्ती है, तो कहीं गुलाल और रोली का तिलक। लोकगीतों की धुनों पर थिरकती 'होली की टोली' और हंसी-ठिठोली का दौर शुरू हो चुका है। परंपराओं के साथ आधुनिकता का रंग भी इस 'होली की झोली' में समाया हुआ है।
बुजुर्गों का कहना है कि होली आपसी गिले-शिकवे भुलाने का पर्व है। इसीलिए तो डंडाडोली और हंसी-मजाक के बीच एक ही गूंज सुनाई देती है— 'बुरा न मानो होली है'। भीलवाड़ा के बाजारों में भी चूनर और रंगों की खरीदारी के लिए उत्साह देखा जा रहा है।
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