मांडल का ऐतिहासिक नाहर नृत्य: 413 वर्षों की परंपरा देख अभिभूत हुए उपमुख्यमंत्री और सतीश पूनिया
भीलवाड़ा सोनिया सागर | जिले के मांडल कस्बे में 413वें ऐतिहासिक 'नाहर (शेर) नृत्य' का आयोजन भव्यता के साथ संपन्न हुआ। इस अनूठी सांस्कृतिक विरासत को निहारने के लिए प्रदेश के उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बेरवा और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया विशेष रूप से मौजूद रहे। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर कलाकारों के अद्भुत कौशल को देख दोनों दिग्गज नेता मंत्रमुग्ध हो गए। इस दौरान मांडल और मांडलगढ़ के विधायक भी उपस्थित थे।
रुई लपेटकर रचा 'शेर' का स्वांग
पूर्व राजस्व मंत्री रामलाल जाट के प्रयासों से 33 लाख रुपये की लागत से निर्मित नवनिर्मित स्टेडियम में आयोजित इस उत्सव में कलाकारों ने अपने शरीर पर कई किलो रुई लपेटकर खूंखार नाहर (सिंह) का रूप धारण किया। ढोल और नगाड़ों की गूंज के बीच जब इन कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया, तो न केवल भीलवाड़ा बल्कि दूर-दराज से आए हजारों दर्शक भी दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो गए।
मुगल काल से जुड़ा है इतिहास
बुजुर्गों और जानकारों के अनुसार, इस नृत्य का इतिहास वर्ष 1614 से जुड़ा है। उस समय मुगल बादशाह शाहजहां, मेवाड़ महाराणा अमर सिंह से संधि करने के लिए उदयपुर जा रहे थे। मांडल में उनके पड़ाव के दौरान मनोरंजन के लिए स्थानीय लोगों ने यह स्वांग रचा था। तब से यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी 'रंग तेरस' के अवसर पर निभाई जा रही है।
भाईचारे और आस्था का संगम
मान्यता है कि यह नृत्य नरसिंह अवतार से भी संबंधित है। इस उत्सव के लिए कस्बे की बेटियां और दामाद भी विशेष रूप से गांव आते हैं, जो आपसी भाईचारे की मिसाल पेश करता है। रंग तेरस पर सुबह लोग गुलाल की होली खेलते हैं और अपने आराध्य राधा-कृष्ण को रिझाते हैं। शाम को बेगम-बादशाह की सवारी निकाली जाती है, जिसके पश्चात नाहर नृत्य का मुख्य आकर्षण शुरू होता है। यह नृत्य साल में केवल एक बार 'राम और राज' (देवता और शासन) के सम्मुख ही प्रस्तुत किया जाता है।
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