​लोकतंत्र के उत्सव पर 'सेंसरशिप' का पहरा! चुनाव आयोग ने मीडिया के हाथ बांधे, बिना कैमरे के कैसे होगी निष्पक्षता की निगरानी?

​लोकतंत्र के उत्सव पर सेंसरशिप का पहरा! चुनाव आयोग ने मीडिया के हाथ बांधे, बिना कैमरे के कैसे होगी निष्पक्षता की निगरानी?
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​भीलवाड़ा हलचल| आगामी पंचायती राज चुनावों को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग ने जो नई गाइडलाइन जारी की है, उसने स्वतंत्र पत्रकारिता के गलियारों में हलचल मचा दी है। 'निष्पक्षता और पारदर्शिता' का हवाला देकर जारी किए गए ये नियम असल में मीडिया की आवाज़ और कैमरों की नज़र पर 'डिजिटल लॉक' लगाने जैसे नजर आ रहे हैं।


​बूथ के भीतर कैमरा-मोबाइल 'नो एंट्री'

​आयोग के ताजा फरमान के अनुसार, अब मतदान केंद्रों और मतगणना स्थलों पर मीडिया कर्मी केवल 'दर्शक' बनकर रह जाएंगे। जिला निर्वाचन अधिकारी का पास होने के बावजूद बूथ के भीतर मोबाइल ले जाने और वीडियोग्राफी या फोटोग्राफी करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। डिजिटल युग में जब पल-पल की रिपोर्टिंग जरूरी है, तब कैमरे पर यह पाबंदी चुनावी शुचिता पर सवाल खड़े करती है। आखिर बिना तस्वीरों और वीडियो के धांधली या अव्यवस्था की पोल कैसे खुलेगी?

​अधिकारियों को मिला 'विशेषाधिकार' का डंडा

​हैरानी की बात यह है कि आयोग ने पीठासीन अधिकारियों (PO) और रिटर्निंग ऑफिसर्स को 'विशेषाधिकार' के नाम पर असीमित शक्तियां दे दी हैं। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 131 का सहारा लेकर अब अधिकारी किसी भी पत्रकार को, जिसके पास वैध पास है, केंद्र से बाहर निकाल सकते हैं। यह प्रावधान अधिकारियों को एक ऐसा हथियार देता है, जिससे वे अपनी मर्जी के खिलाफ होने वाली किसी भी निष्पक्ष रिपोर्टिंग को 'गोपनीयता' के नाम पर कुचल सकते हैं।

​सूचनाओं पर अघोषित 'इमरजेंसी'!

​आयोग ने मीडिया की उपस्थिति को भी बेहद सीमित कर दिया है। एक समाचार पत्र से केवल एक पत्रकार और एक फोटोग्राफर को ही प्रवेश मिलेगा, वह भी तब जब 15 दिन पहले अनुशंसा भेजी गई हो। सबसे चौंकाने वाला नियम यह है कि पंचायत मुख्यालय पर होने वाली मतगणना में पत्रकारों के प्रवेश को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है।

​तर्क दिया जा रहा है कि यह 'मतों की गोपनीयता' के लिए है, लेकिन सवाल वही है—क्या गोपनीयता के नाम पर जनता तक पहुँचने वाली सच की आवाज़ को दबाया जा रहा है?

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