स्मृतियों के रंग:: भीलवाड़ा की गलियों से गायब होती धुलेंडी की वह जीवंतता और फागुनी मस्ती

भीलवाड़ा की गलियों से गायब होती धुलेंडी की वह जीवंतता और फागुनी मस्ती
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भीलवाड़ा विजय गढ़वाल | समय का पहिया ऐसा घूमा कि वस्त्र नगरी भीलवाड़ा की धुलेंडी की वह ऐतिहासिक रंगत अब केवल पुरानी यादों और किस्सों तक सीमित रह गई है। कुछ सालों पहले तक शहर की सड़कों और गली-मोहल्लों में जो उत्साह और प्रेम का सैलाब उमड़ता था, आज उसकी जगह सन्नाटे और औपचारिकता ने ले ली है। तकनीक और बदलती जीवनशैली ने त्योहार के उस सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है, जहाँ रंगों से पहले दिलों का मिलन होता था।

पांसल रोड की वह 'हांडी' और माखन चोरों की टोली



भीलवाड़ा की धुलेंडी का जिक्र हो और पांसल रोड की हांडी प्रतियोगिता की बात न हो, यह मुमकिन नहीं। एक दौर था जब पांसल रोड पर आयोजित होने वाली 'हांडी फोड़' और 'माखन चोर' प्रतियोगिता आकर्षण का केंद्र होती थी। लोग इस रोमांचक नजारे को देखने उमड़ते थे, लेकिन समय की मार और बदलती प्राथमिकताओं के कारण यह आयोजन अब बंद हो गए हैं। सड़कों पर जो रंगों की परतें जम जाती थीं, वे अब केवल साफ-सुथरे डामर की याद दिलाती हैं।

पानी, गुलाल और वह सामूहिक प्रेम

पहले धुलेंडी का मतलब केवल रंग लगाना नहीं, बल्कि सामूहिक उमंग था। टोलियों में निकले युवा, पानी की बौछारें और गुलाल के बाद नजर आने वाले चेहरों में जो 'अपनापन' और 'प्यार' झलकता था, वह आज के 'डिजिटल' दौर में दुर्लभ हो गया है। आज न तो वह टोलियां नजर आती हैं और न ही गली-मोहल्लों में वह शोर सुनाई देता है। लोग अब घरों की चारदीवारी में कैद होकर सोशल मीडिया पर स्टेटस अपडेट करने को ही त्योहार मानना बेहतर समझने लगे हैं।

रिश्तों पर जमी धूल साफ करने की जरूरत

आज भीलवाड़ा की सड़कें और मोहल्ले संवादहीन नजर आते हैं। पहले सुरक्षा और आपसी विश्वास का वह वातावरण था कि हर कोई हर किसी को रंग लगाने का हक रखता था। आज असुरक्षा और संदेह के घेरे ने त्योहार की सहजता छीन ली है। वर्तमान हालात हमें सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या हम अपनी परंपराओं को सहेज पा रहे हैं? होली और धुलेंडी केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि दिलों की कड़वाहट धोने का अवसर था। आज जरूरत है कि हम फिर से उसी पुरानी मस्ती और प्रेम को लौटाएं, ताकि भीलवाड़ा की धुलेंडी फिर से अपनी पहचान पा सके।

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