सत्ता की नींद उड़ाने उतरे लोकतंत्र के प्रहरी:: आसींद में पत्रकारों का 'आर-पार' का शंखनाद

आसींद में पत्रकारों का आर-पार का शंखनाद
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आसींद (हलचल)

जिस कलम को जनता की समस्याओं का समाधान लिखना था, आज उसी कलम के सिपाही प्रशासन की बेशर्मी के खिलाफ सड़क पर बैठने को मजबूर हैं। नेशनल हाईवे-158 के महज 700 मीटर के अधूरे टुकड़े ने आसींद प्रशासन और एनएचएआई के दावों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। महीनों से उड़ती धूल और होते हादसों पर जब हुक्मरानों ने आंखें मूंद ली, तो प्रेस क्लब आसींद के बैनर तले पत्रकारों ने अनिश्चितकालीन धरने का बिगुल फूंक दिया। सवाल यह है कि जिस सिस्टम को आम आदमी की चीखें सुनाई नहीं दीं, क्या वह अब इन 'जनता की आवाजों' के धरने से जागेगा?

6 महीने से धूल फांक रही जनता, जिम्मेदारों को 'सांप सूंघा'

हैरानी की बात है कि विकास के नाम पर 6 महीने पहले लोगों के आशियाने तो ढहा दिए गए, लेकिन सड़क बनाना प्रशासन भूल गया। आलम यह है कि यह 700 मीटर का हिस्सा अब 'मौत का गलियारा' बन चुका है।

* खून से लिखे खत भी बेअसर: ग्रामीणों ने अपने खून से पत्र लिखकर गुहार लगाई, चक्का जाम किया, लेकिन साहबों की कुर्सी नहीं हिली।

* धूल का गुबार, बीमार शहर: दिन-रात उड़ती मिट्टी ने लोगों के फेफड़े छलनी कर दिए हैं, मगर फाइलों में विकास की रफ्तार तेज दिखाई जा रही है।

कलम छोड़ पकड़ी दरी, अब आर-पार की लड़ाई


धरने पर बैठे पत्रकार दिनेश साहू, निसार अहमद शेख और सम्पत शर्मा सावरमल शर्मा ने दो टूक कहा कि हम खबरें लिखकर थक चुके हैं, अब हकीकत दिखाने का वक्त है। प्रशासन की संवेदनहीनता की हद देखिए कि रक्षक ही भक्षक बने बैठे हैं। पत्रकारों ने साफ कर दिया है कि अब कोरे आश्वासनों का दौर बीत चुका है। जब तक मौके पर मशीनें नहीं उतरेंगी और निर्माण शुरू नहीं होगा, यह धरना खत्म नहीं होगा। मौके पर भारी संख्या में पत्रकार साथियों और ग्रामीणों का जमावड़ा प्रशासन की चूलें हिलाने के लिए तैयार है।

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