भीलवाड़ा में 200 साल पुरानी 'कोड़ामार होली': जीनगर समाज की अनूठी परंपरा, नारी शक्ति और सामाजिक समरसता की मिसाल

भीलवाड़ा विजय गढ़वाल। रंगों के त्यौहार होली की खुमारी देश भर में उतरी नहीं है, लेकिन भीलवाड़ा शहर के गुलमण्डी-सर्राफा बाजार क्षेत्र में 'रंग तेरस' (होली के 13वें दिन) पर एक ऐसी होली खेली जाती है, जो न केवल अनूठी है, बल्कि नारी शक्ति और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। हम बात कर रहे हैं जीनगर समाज द्वारा पिछले लगभग दो सौ वर्षों से मनाई जा रही ऐतिहासिक 'कोड़ामार होली' की। गुरुवार को इस पारंपरिक उत्सव में समाज के हजारों महिला-पुरुषों ने गाजे-बाजे के साथ शिरकत की, जिससे पूरा इलाका रंगों और कोड़ों की गूंज से सराबोर हो गया।
नारी सशक्तिकरण की नींव पर टिकी परंपरा
इस परंपरा के पीछे एक गहरा सामाजिक उद्देश्य छिपा है। जीनगर समाज के वरिष्ठ सदस्य कैलाश जीनगर ने बताया कि लगभग दो सदी पहले हमारे बुजुर्गों ने सोचा था कि महिलाओं को सशक्त और आत्मविश्वास से परिपूर्ण महसूस कराने के लिए कोई ऐसा पर्व मनाया जाए, जहाँ वे पुरुषों के साथ बराबरी से भाग ले सकें। इसी सोच के साथ 'कोड़ामार होली' की शुरुआत की गई। यह त्योहार आज भी हमें याद दिलाता है कि महिलाएँ पुरुषों के बराबर हैं और उनका सम्मान करना समाज का कर्तव्य है।
कोड़ों की मार और रंगों की फुहार: एक रोमांचक मुकाबला
गुलमण्डी में आयोजित इस अनूठे उत्सव में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से लोग पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर नाचते-गाते पहुँचते हैं। मुख्य मुकाबला पानी और रंगों से भरे विशाल 'कढ़ाव' (बर्तन) के पास होता है।कोड़ों की तैयारी: महिलाएँ पहले से ही सूती साड़ियों को गूंथकर मजबूत और टिकाऊ 'कोड़े' तैयार कर लेती हैं।
रोमांचक युद्ध: महिलाएँ कढ़ाव के चारों ओर रक्षा पंक्ति बनाकर खड़ी हो जाती हैं। पुरुष डोलची (बाल्टी) भरकर कढ़ाव से रंगीन पानी निकालते हैं और महिलाओं पर फेंकने की कोशिश करते हैं।
शर्त और जीत: इस दौरान महिलाएँ पुरुषों पर जोर-जोर से कोड़े बरसाती हैं। कोड़ों की मार से बचते हुए जो पुरुष कढ़ाव के पानी को महिलाओं पर डालने में सफल होता है और कढ़ाव पर कब्ज़ा करता है, उसे ही 'विजेता' माना जाता है। कोड़ों की यह मार "प्यार और सम्मान" का प्रतीक मानी जाती है।
उत्साह और नई पीढ़ी की भागीदारी
इस परंपरा के प्रति समाज का उत्साह आज भी बरकरार है। महिला पवन देवी जीनगर ने बताया, "हमें साल भर इस त्योहार का इंतज़ार रहता है। यह परंपरा हमारे बुजुर्गों ने शुरू की थी, और अब हम इसे गर्व से आगे बढ़ा रहे हैं।" उत्सव में नवविवाहित जोड़ों की भागीदारी विशेष आकर्षण का केंद्र होती है। नए जोड़े होली खेलने के बाद बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं।
सामाजिक समरसता का प्रतीक 'स्नेह भोज'
'कोड़ामार होली' केवल एक खेल नहीं, बल्कि समाज में एकता और भाईचारे को मजबूत करने का माध्यम भी है। खेल के समापन के बाद शाम को पूरे जीनगर समाज का एक सामूहिक 'स्नेह भोज' (प्रीतिभोज) आयोजित किया जाता है। यहाँ सभी लोग, चाहे वे खेल में विजेता हों या उपविजेता, साथ बैठकर भोजन करते हैं और एक-दूसरे को रंग तेरस की बधाई देते हैं। यह परंपरा आपसी मतभेद भुलाकर समाज में प्रेम और समरसता कायम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।जीनगर समाज की यह ऐतिहासिक परंपरा आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़े रहने और नारी शक्ति का सम्मान करने का एक जीवंत उदाहरण है।
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