चार दुखों से कोई नहीं बचाएगा: सुकुन मुनि

चार दुखों से कोई नहीं बचाएगा: सुकुन मुनि
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आसींद (सुरेन्द्र संचेती) | श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ आसींद के तत्वाधान में आयोजित धर्म सभा को संबोधित करते हुए श्रमण संघ के प्रमुख संत प्रवर्तक सुकन मुनि महाराज ने कहा कि जन्म जरा रोग और मृत्यु से कोई किसी को नहीं बचा सकता है और कोई वचन भी नहीं दे सकता कि इनसे बच सकता है। जन्म का दुख बड़ा दुखदाई है, गर्भ के अंदर एक छोटी सी थैली में कैद रहना अति वेदना का काल होता है। बुढ़ापा आने पर परिवार वाले भी दरकिनार कर देते हैं। जैसे फटा कपड़ा रख दिया जाता है, वैसे बुढ़ापा आने पर बुजुर्गों को एक किनारे रख दिया जाता है। रोग का उदय होने पर मनुष्य का शरीर क्षीण हो जाता है और ऐसे ही रोग अवस्था में वह कोई भी श्रेष्ठ कार्य भी नहीं कर सकता है। मरण मृत्यु कष्टदाई होती है और कोई भी व्यक्ति मरने से बच भी नहीं सकता है।

उपप्रवर्तक अमृत मुनि महाराज ने धर्म सभा में कहा कि जो व्यक्ति शरीर और आत्मा की स्वाभाविक स्थिति को नहीं समझता, वह जीवन की शारीरिक अवधारणा से बहुत अधिक आसक्त हो जाता है। परिणामस्वरूप, शरीर और उसके उपोत्पादों से आसक्ति के कारण, वह अपने परिवार, समाज और राष्ट्र से जुड़ाव और अलगाव से प्रभावित महसूस करता है। जब तक यह जारी रहता है, तब तक व्यक्ति अपना भौतिक जीवन जारी रखता है। जब तक कोई जीवन की शारीरिक अवधारणा में है, उसे भौतिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। शरीर जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और रोग के अपने सिद्धांतों के अधीन है, लेकिन जो व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन में स्थित है। उसका न तो जन्म होता है, न मृत्यु, न बुढ़ापा और न ही कोई रोग।

धर्म सभा में मधुर गायक संत महेश मुनि, संत अखिलेश मुनि एवं डॉ वरुण मुनि ने कहा कि दुनिया तो बहुरंगी है, वह तो हर किसी की, अच्छे कार्य करने वाले और बुरे कार्य करने वाले दोनों की आलोचना करती है। इस आलोचना से घबराकर हमें अपना सत्पथ नहीं छोड़ना चाहिए।

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