मन को एकाग्र करने के लिए साधना आवश्यक है: धैर्य मुनि

आसींद (सुरेन्द्र संचेती) भगवान महावीर ने संसार के दुःखी प्राणियों को सुख का मार्ग बताया है। वर्तमान में हर प्राणी किसी ना किसी कारण से दुःखी है। व्यक्ति की अपेक्षाएं एवं इच्छाएं अधिक होने एवं उनकी पूर्ति नहीं होने से वह दुःखी है। मन को एकाग्र करने के लिए साधना करने की जरूरत है। मन से व्यक्ति नरक में और मोक्ष में जा सकता है। मन की गति सूर्य की गति से भी कई गुना तेज होती है। मन में शुद्ध भाव है तो क्रिया उसी के अनुरूप होती है। मन को सदेव निर्मल और पवित्र रखे। उक्त विचार नवदीक्षित संत धैर्य मुनि ने महावीर भवन में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।
साध्वी डॉ दर्शनलता ने कहा कि संसार में दो प्रकार की दृष्टि होती है। एक गुणानुरागी दृष्टि और दूसरी दोष दृष्टि। गुणानुरागी दृष्टि वाला व्यक्ति जहां भी जाएगा हर व्यक्ति की अच्छाई देखता है, दोष दृष्टि वाला ईर्ष्या का भाव पैदा करता है। दोष दृष्टि का सदेव त्याग करे। गुण देखने वाला प्रशंसक कहलाता है वह सुई के समान होता है। दोष देखने वाला निंदक कहलाता है और वह कैंची के समान होता है।
साध्वी ऋजु लता ने धर्मसभा में कहा कि समय को पहचाने जिसने समय को नहीं पहचाना वह कभी भी कोई भी उपलब्धि हासिल नहीं कर सकता है। दूसरा धैर्य रखना सीखें, कितना भी दुःख आ जावे, कष्ट आ जावे, संपति नष्ट हो जावे ,कितना ही नुकसान चला जावे लेकिन उस समय धैर्य नहीं खोवे। जीवन में शिष्टाचार का पालन करे जिसमें शिष्टता नहीं होती वह व्यक्ति कभी भी आगे नहीं बढ़ सकता है। सुख में कभी फूलना नहीं और दुःख में कभी घबराना नहीं है। हमारा जीवन सुख दुःख के मेलजोल का है। जीवन में अगर किसी कारण से दुःख आ भी जावे तो घबराना नहीं वह हमें कोई ना कोई प्रेरणा देकर जाएगा। धर्म सभा में रामगढ़, शंभुगढ़ के श्रावक श्राविकाएं भी उपस्थित थे। संघ के पूर्व मंत्री देवी लाल पीपाड़ा ने सभी आगंतुकों के प्रति आभार ज्ञापित किया।
