मेवाड़ की विरासत और माण्डल का नाहर नृत्य: कला या गुलामी का प्रतीक?

माण्डल (भीलवाड़ा)। मेवाड़ की माटी अपनी आन-बान-शान और मुगलों के विरुद्ध अदम्य साहस के लिए विश्वविख्यात है। लेकिन इसी मेवाड़ के माण्डल कस्बे में प्रतिवर्ष रंग तेरस पर आयोजित होने वाला 'नाहर नृत्य' आज एक वैचारिक बहस के केंद्र में है। प्रश्न यह उठ रहा है कि जो नृत्य मुगल शहजादे खुर्रम (शाहजहाँ) के मनोरंजन के लिए शुरू हुआ था, वह आजादी के दशकों बाद भी क्यों जारी है? क्या यह एक लोक कला का संरक्षण है या अनजाने में ढोई जा रही किसी पुरानी अधीनता की निशानी?
ऐतिहासिक संदर्भ और परंपरा का जन्म
इतिहास के झरोखों से देखें तो यह परंपरा 1614 ईस्वी के आसपास की बताई जाती है। जब शहजादा खुर्रम मेवाड़ अभियान के दौरान माण्डल में ठहरा था, तब स्थानीय कलाकारों ने रुई लपेटकर 'नाहर' (शेर) का स्वांग रचा था। खुर्रम की प्रसन्नता और उसके द्वारा दिए गए 'शाही सनद' ने इस आयोजन को एक वार्षिक उत्सव का रूप दे दिया। जानकारों का मानना है कि उस दौर में सत्ता को खुश करना मजबूरी रही होगी, लेकिन पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह पाराशर परिवार और स्थानीय समुदाय के लिए एक 'अनुष्ठान' बन गया।
विरोध के स्वर: स्वाभिमान बनाम रीत
आलोचकों का तर्क है कि मेवाड़ वह भूमि है जहाँ महाराणा प्रताप ने घास की रोटी खाना स्वीकार किया लेकिन मुगलों के आगे सिर नहीं झुकाया। ऐसे में एक मुगल शहजादे के मनोरंजन के लिए शुरू हुई प्रथा को 'परंपरा' मानकर ढोना, मेवाड़ के मूल चरित्र के विपरीत प्रतीत होता है।
सत्ता परिवर्तन के बाद भी निरंतरता: शाहजहाँ की मृत्यु, मुगलों के पतन और फिर अंग्रेजों की विदाई के बाद भी इस नृत्य का जारी रहना कई सवाल खड़े करता है।
कला का स्वरूप: समर्थक इसे 'बहरूपिया कला' का एक उत्कृष्ट नमूना मानते हैं, जिसे अब किसी व्यक्ति विशेष की गुलामी से जोड़कर नहीं, बल्कि पूर्वजों की विरासत के रूप में देखा जाता है।
आजादी का मोल: क्या लोकतांत्रिक भारत में भी हमें उन प्रतीकों को सहेजना चाहिए जिनकी जड़ें औपनिवेशिक या सामंती चाटुकारिता में रही हों? यह आत्ममंथन का विषय है।
क्या यह केवल एक लोक उत्सव है?
आज नाहर नृत्य को देखने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ती है। स्थानीय लोगों के लिए यह होली के उल्लास का हिस्सा बन चुका है। लेकिन इतिहास की दृष्टि से यह एक जटिल पहेली है। क्या यह समय आ गया है कि माण्डल के इस आयोजन को इसके 'मुगलिया' संदर्भ से काटकर केवल एक क्षेत्रीय लोक कला के रूप में परिभाषित किया जाए, या फिर इसके इतिहास को देखते हुए इसे मेवाड़ के स्वाभिमान की कसौटी पर परखा जाए?
