महंगाई की मार:: भीलवाड़ा में सोना-चांदी ने बिगाड़ा शादियों का बजट, खाली हाथ लौट रहे ग्राहक, कारीगरों के चूल्हे ठंडे

भीलवाड़ा हलचल। भीलवाड़ा सहित देशभर में सोना-चांदी की कीमतों में आई भारी उछाल ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। शादियों का सीजन होने के बावजूद सर्राफा बाजारों में रौनक गायब है। गहने खरीदना तो दूर, लोग अब ज्वेलर्स की दुकानों की तरफ देखने से भी कतरा रहे हैं। अचानक बढ़े इन भावों ने न केवल ग्राहकों को, बल्कि ज्वेलर्स और आभूषण कारीगरों को भी संकट में डाल दिया है।




सूने पड़े कारखाने, कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट

स्वर्ण व्यापारियों का कहना है कि ऊंचे भावों के कारण गहनों के नए ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं। भीलवाड़ा के प्रमुख ज्वेलर्स ने बताया कि गहने बनाने वाले कारखाने पूरी तरह सूने पड़े हैं। जो कारीगर दिन-रात मेहनत करते थे, वे आज खाली बैठे हैं। व्यापारियों के अनुसार, फिजिकल बिक्री के मुकाबले अब निवेशक ऑनलाइन माध्यमों (डिजिटल गोल्ड/ETF) की तरफ ज्यादा रुख कर रहे हैं, जिससे स्थानीय बाजार की स्थिति और खराब हो गई है।

सोशल मीडिया पर छलका महिलाओं का दर्द

सोना-चांदी की कीमतों को लेकर सोशल मीडिया पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। आरती नामक यूजर ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए लिखा, "अब गरीब और मिडिल क्लास के लिए सोना-चांदी सपना हो गया है। शादीशुदा महिलाओं के लिए अब सिर्फ बिंदी और सिंदूर ही बचा है। मंगलसूत्र और बिछिया जैसी चीजें भी इतनी महंगी कर दी गई हैं कि आम इंसान इन्हें खरीदने की हिम्मत नहीं कर पा रहा।"

क्यों घटते-बढ़ते हैं भाव? (विशेष विश्लेषण)

सोशल मीडिया पर जुमा जैसे कई यूजर्स इस बात को लेकर हैरान हैं कि सोने-चांदी के भाव रोज कैसे बदल जाते हैं। कई लोग इसके लिए सीधे सरकार या किसी व्यक्ति को जिम्मेदार मानते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इसके पीछे कई वैश्विक कारण (Global Factors) होते हैं:

अंतर्राष्ट्रीय बाजार: डॉलर की मजबूती या कमजोरी का सीधा असर सोने पर पड़ता है।

वैश्विक तनाव: युद्ध (जैसे यूक्रेन-रूस या इजरायल-हमास) के समय निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में सोना खरीदते हैं, जिससे भाव बढ़ते हैं।

डिमांड और सप्लाई: शादियों के सीजन में मांग बढ़ने पर अक्सर कीमतें चढ़ जाती हैं।

बुजुर्गों और स्थानीय लोगों की तीखी प्रतिक्रिया

महंगाई पर अपनी राय रखते हुए पिंकू खोटानी ने कहा कि "जीवन के लिए सोना महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन जो बुनियादी चीजें हैं, वे भी गरीबों की पहुंच से बाहर हो रही हैं।" वहीं, वरिष्ठ नागरिक देवकिशन कुम्हार, राजेश तोषनीवाल और मोहन लाल ने भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका कहना है कि शादियों के इस दौर में मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए मान-मर्यादा निभाना भी मुश्किल हो गया है। बुजुर्गों का मानना है कि इतनी महंगाई ने समाज के उत्सवों का आनंद ही छीन लिया है।

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