अफीम की खेती की प्रक्रिया और सरकारी नियमों पर दी जानकारी

आकोला (रमेश चंद्र डाड) । क्षेत्र के अनुभवी काश्तकारों श्यामलाल काबरा, कन्हैयालाल काबरा और काशीराम गुर्जर ने अफीम की खेती की जटिल प्रक्रिया और इसके महत्व पर विस्तृत प्रकाश डाला है। जानकारों ने बताया कि अफीम की फसल एक अत्यंत संवेदनशील और निगरानी वाली खेती है।
खेती की प्रक्रिया और संग्रहण: अफीम के डोडे तैयार होने पर उनमें चीरा लगाया जाता है, जिसके बाद उन्हें रात भर के लिए छोड़ दिया जाता है। अगले दिन सुबह डोडों से निकले प्राकृतिक तरल पदार्थ (लेटेक्स) को एकत्रित किया जाता है। यही तरल पदार्थ औषधीय गुणों से भरपूर होता है और विभिन्न जीवन रक्षक दवाइयां बनाने के काम आता है। जब डोडों से तरल निकलना बंद हो जाता है, तब फसल को सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है। पूर्णतः सूखने के बाद डोडों को तोड़कर उनसे बीज (खसखस) निकाल लिए जाते हैं।
सरकारी नियंत्रण और खरीद: अफीम की पूरी खेती केंद्र सरकार के कड़े नियंत्रण में होती है। नियमानुसार, हर साल अप्रैल माह में नार्कोटिक्स विभाग (अफीम विभाग) सीधे किसानों से निर्धारित केंद्रों पर इस फसल की खरीदारी करता है। किसानों ने स्पष्ट किया कि बिना सरकारी लाइसेंस और अनुमति के अफीम की खेती करना कानूनन गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। इसका मुख्य उपयोग केवल औषधीय और वैज्ञानिक कार्यों के लिए ही किया जाता है।
