रूक्मणी ने किया भगवान कृष्ण का वरण, हर्षित हुए भक्तगण, गूंजे द्वारिकाधीश के जयकारे

भीलवाड़ा, । शादी का मंच सजा हुआ था और बाराती कोई साधारण नहीं बल्कि ब्रह्म देव, महादेव शंकर सहित कई देवी-देवता थे। बारात किसी ओर की नहीं स्वयं द्वारिकाधीश भगवान श्रीकृष्ण की थी। बारात में आज मेरे श्याम की शादी है, आज मेरे भगवान की शादी है जैसे गीत गूंज रहे थे और बाराती जमकर नाच-गान कर रहे थे। ये नजारा शनिवार दोपहर शहर के रोडवेज बस स्टेण्ड के पास अग्रवाल उत्सव भवन में स्व. श्रीमती गीतादेवी तोषनीवाल चेरिटेबल ट्रस्ट भीलवाड़ा की ओर से रामस्नेही संत प्रखर वक्ता संत दिग्विजयरामजी महाराज के मुखारबिंद से सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान सप्ताह के छठे दिन रूक्मणी विवाह प्रसंग के वाचन के दौरान दिखा। छठे दिन उद्धव गोपी संवाद, रूक्मणी विवाह प्रसंग का वाचन किया गया। इस दौरान कृष्ण-रूक्मणी विवाह की सजीव झांकी सजाई गई। प्रतीकात्मक रूप से मंच पर विवाह प्रसंग का नजारा पेश किया। जैसे ही रूक्मणी ने पति के रूप में भगवान कृष्ण का वरण करते हुए उनके गले में वरमाला डाली पांडाल में मौजूद सैकड़ो भक्तगण हर्षित होकर द्वारिकाधीश भगवान श्रीकृष्ण के जयकारे गूंजायमान करने लगे। हर तरफ खुशियां छा गई और हर भक्त भगवान कृष्ण की शादी के मंचन का साक्षी बन उल्लासित नजर आया और नाच-गाने के माध्यम से अपनी खुशियां जताने को आतुर दिखा। मंत्रोच्चार के साथ कृष्ण-रूक्मणी विवाह हुआ। संत दिग्विजयरामजी महाराज ने रूक्मणी विवाह प्रसंग का वाचन करते हुए कहा कि रूक्मणी ने देवर्षि नारद से जब श्रीकृष्ण की कथा सुनी थी तभी मन ही मन कृष्ण को अपने पति रूप में चुन लिया था। उनके संदेश पर ही भगवान श्रीकृष्ण मां भगवती के मंदिर में उसे लेने पहुंचे और हर तरह के प्रतिरोध को समाप्त कर रूक्मणी संग द्वारिका पहुंचे तो वहां हर्ष का माहौल बन गया। कथा मंडप में भगवान श्री कृष्ण के बारात की झांकी व रूकमणी के विवाह का दृश्य हजारों दर्शकों के लिए आनंदित करने वाला हो गया।
रूक्मणी मंगल प्रसंग के लिए कथास्थल पर विशेष सजावट की गई थी। उन्होंने महारास लीला प्रसंग का वाचन करते हुए कहा कि महारास से परमात्मा की प्राप्ति का लक्ष्य पूरा हो रहा है जहां उनमें रम कर उनको आत्मसात किया जा सकता है। इन्द्रियां जिनके इशारे पर चलती है वह उनका स्वामी गोपाल है। गोपाल गोपियों को महारास के लिए आमंत्रित करता है तो वह सब काम छोड़ दौड़ी चली आती है। राधारानी और गोपियों का कृष्ण से प्रेम दैहिक नहीं होकर आत्मिक है। प्रेम हो तो राधा जैसा जिसने आत्मा से प्रेम किया। योगमाया ही राधारानी है। वह प्रेमिका नहीं उपासिका है। राधा को समझने के लिए मानव चक्षु नहीं दिव्य चक्षु चाहिए। गोविन्द ने राधा की उपासना, प्रार्थना व वंदना कर महारास करने का निश्चय किया। दुनियां के सारे रसो का उद्गम स्थल महारास है। महारास में सभी प्रेम के उपासक होकर नृत्य करते है।संत दिग्विजयराम ने कहा कि जीवन में भक्ति भाव को अंगीकार करना हो तो गोपी भाव को प्रधानता दे तभी ईश्वर प्राप्ति संभव हैं। उन्होंने शरद पुर्णिमा की मध्य रात्रि को हुए महारास में गौकुल वृद्धावन की समस्त गोपियों एवं देवताओं के साथ वेणुगीत के बीच महारास की चर्चा करते हुए कहा कि राधा रानी भी महारास में भागीदार बनी।
*मुझे श्याम सुंदर की दुल्हन बना दो जैसे भजनों पर झूमते रहे श्रद्धालु*
श्रीमद् भागवत कथा महोत्सव में छठे दिन भी कथा शुरू होने से लेकर अंत तक श्रद्धालु संगीतमय भक्तिरस में डूबे रहे। श्रीमद् भागवत कथा के महारास लीला एवं रूक्मणी विवाह प्रसंगों के वाचन के दौरान बीच-बीच में भजनों की गंगा प्रवाहित होती रही। जैसे ही भजन शुरू होता श्रद्धालु अपनी जगह खड़े होकर नृत्य करने लगते। उन्होंने आओ सखी मुझे मेहंदी लगा दो मुझे श्याम सुंदर की दुल्हन बना दो, बन्नो मारो द्वारिका नाथ बन्नी तो मारी रूकमण लाड़ली, ये तो प्रेम की बात है बदंगी तेरे बश की नहीं है आदि भजन गाए तो पांडाल में सैकड़ो श्रद्धालु नृत्य करने से खुद को नहीं रोक पाए।संतश्री ने निराले अंदाज में राधा नाचे कृष्ण नाचे नाचे गोपीजन भजन की प्रस्तुति दी तो कथा मंडप भी महारास मंडप में निरूपित हो गया। कथा प्रारंभ एवं समापन के अवसर पर आयोजक तोषनीवाल परिवार के सदस्यों एवं श्रद्धालुओं ने व्यास पीठ की आरती की। श्रीमद् भागवत कथा के अंतिम दिन रविवार दोपहर 2 से शाम 6 बजे बजे तक सुदामा चरित्र एवं परीक्षित मोक्ष प्रसंग का वाचन होगा। महाआरती के साथ कथा का विश्राम होगा।
*झोली फैला जुटाई घुम्मकड़ परिवारों के बच्चों के लिए सहयोग राशि*
कथा में रुक्मणी विवाह के बाद झोली फेला कर कन्यादान के रूप में एक लाख 71 हजार रुपए की सहयोग राशि एकत्रित की गई। ये राशि केशव आदर्श घुमक्कड़ बेसहारा परिवार के बच्चों की सहायता हेतु चलाये जा रहे आवासीय विद्यालय भीलवाड़ा के अध्यक्ष को सहायतार्थ दी। मूक बधिर विद्यालय सेवा आश्रम भीलवाड़ा हेतु संत दिग्विजयरामजी द्वारा 51 हजार का सहयोग दिया गया।
*तुलसीजी का विवाह रचाया भगवान चारभुजानाथ के संग*
श्रीमद् भागवत कथा के छठे दिन रुक्मिणी विवाह प्रसंग से पूर्व सुबह आयोजक तोषनीवाल परिवार द्वारा तुलसी विवाह सम्पन्न कराया गया। ढोल नगाड़ों की गूंज के बीच तुलसीजी का विवाह भगवान चारभुजानाथ के संग रचाया गया तो भगवान के जयकारे लगे। कथा में संत दिग्विजय रामजी ने कहा कि आज सुखद संयोग है कि सुबह तुलसीजी का विवाह भगवान चारभुजानाथ के संग ओर शाम को भगवान कृष्ण का विवाह रुक्मिणी संग हो रहा है।
