सांवरिया सेठ ने भरा 56 करोड़ का मायरा, भाव-विभोर हुए श्रद्धालु

सांवरिया सेठ ने भरा 56 करोड़ का मायरा, भाव-विभोर हुए श्रद्धालु
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भीलवाड़ा। भगवान को न धन चाहिए, न दौलत; वे तो केवल सच्चे भाव के भूखे हैं। यह उद्गार श्री कुंज में कथावाचक गोवत्स शिवप्रकाश शास्त्री ने तीन दिवसीय नानी बाई रो मायरो कथा के भव्य समापन अवसर पर व्यक्त किए। भक्ति और श्रद्धा के इस अनुपम संगम में पूरा पंडाल सांवरिया सेठ के जयकारों से गूंज उठा। आयोजन प्रमुख शंभू दयाल सोनी एवं प्रहलाद सोनी ने बताया कि कथा के माध्यम से शास्त्री ने नरसी मेहता के जीवन प्रसंगों को जीवंत करते हुए यह सिद्ध किया कि जब भक्त का समर्पण निष्कपट होता है, तब द्वारकाधीश को आज भी अपना सिंहासन छोड़कर भक्त की लाज रखने आना पड़ता है।तीन दिनों तक चली इस भावपूर्ण कथा में श्रद्धालुओं ने भक्ति के अनेक रंग देखे। प्रथम दिन नरसी मेहता के त्याग, वैराग्य और समाज के तानों के बीच उनकी अडिग आस्था का वर्णन किया गया। द्वितीय दिन नानी बाई और पिता के मिलन प्रसंग ने पूरे पंडाल को भाव-विभोर कर दिया और हर आंख नम हो गई। शास्त्री जी ने बताया कि शरणागति ही वह मार्ग है जिससे भगवान को वश में किया जा सकता है। अंतिम दिन का मुख्य आकर्षण रहा छप्पन करोड़ का मायरा’ प्रसंग रहा। जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण के ‘सांवल शाह सेठ’ बनकर नरसी मेहता की सहायता हेतु स्वयं पधारने का वर्णन हुआ, पंडाल भजनों और नृत्य से सराबोर हो गया। “बीरा बण’र आइजो सांवरा” जैसे भजनों पर श्रद्धालु झूम उठे और वातावरण भक्तिमय हो गया। प्रवचनों के दौरान शास्त्री जी ने समाज को आत्ममंथन का संदेश भी दिया। उन्होंने पड़ोसी की उन्नति से ईर्ष्या करने की प्रवृत्ति पर प्रहार करते हुए कहा कि सच्चा भक्त वही है, जो दूसरों के सुख में सुखी हो। साथ ही उन्होंने गौ सेवा के महत्व पर विशेष प्रकाश डालते हुए कहा कि गाय भारतीय संस्कृति की आत्मा है और उसकी सेवा से जीवन में सात्त्विकता व करुणा का विकास होता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को गौ संरक्षण, कन्या भ्रूण हत्या रोकने तथा बाल विवाह के विरोध का संकल्प भी दिलाया।

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