रसधारा के रस में डूबे दर्शक

रसधारा के रस में डूबे दर्शक
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भीलवाड़ा |

रसधारा सांस्कृतिक संस्थान भीलवाड़ा द्वारा आयोजित कला एवं संस्कृति विभाग राजस्थान सरकार, RCM एवं नगर निगम भीलवाड़ा द्वारा प्रायोजित चार दिवसीय नाट्य महोत्सव के अंतर्गत तीसरे दिन,प्रातः 10 बजे रंग वार्ता में नाटक सईयां भये कोतवाल के निर्देशक निरंजन कुमार से नाटक पर चर्चा की गयी एवं साथ ही लोक नाट्य और आधुनिक नाटकों में बुनियादी अंतर पर अर्जुन देव चारण, स्वाति व्यास, राघवेंद्र रावत, ईश्वर दत्त माथुर, गोपाल आचार्य , नवल कुमार, देशराज मीणा, शिव प्रसाद ने दर्शकों से अपने विचार साझा किए। तत्पश्चात शाम को 5 बजे रविन्द्र नाथ टैगोर लिखित,कम्युनिटी थियेटर टोंक की प्रस्तुति डाकघर का मंचन रसधारा सभागार में हुआ। जिसका निर्देशन चितरंजन नामा ने किया। नाटक का केंद्र बिंदु है अमल, एक बालक जो गंभीर बीमारी के कारण अपने घर की चारदीवारी में कैद है। यह कैद केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानवीय जीवन में उपस्थ्ति सीमाओं और बंधनों का प्रतीक है। शरीर से बंधा हुआ अमल अपनी कल्पनाओं के पंखों पर उड़ता है। उसकी दृष्टि, उसकी इच्छाएँ और उसकी बातें खिड़की से बाहर खुली दुनिया की ओर बढ़ती है। यह राहगीरों से संवाद करता है, बाहर के संसार की ध्वनियों और रंगों को आत्मसात करता है, और उन्हीं क्षणों में जीवन की सच्ची स्पंदना को महसूस करता है। डाकघर अपनी सादगी में गहन अर्थों को समेटे हुए है। यह नाटक दर्शकों को आमंत्रित करता है कि वे जीवन के छोटे-छोटे क्षणों में छिपी स्वतंत्रता, संवाद और मानवीय संवेदना को महसूस करें। मंच पर आशीष चावला, मणिकांत, वैद्य रामरतन गुगालिया,शादाब सिद्दीकी, आफताब नूर, करण कुमार, राजयंती तामोली, अदनान खान, मोहित वैष्णव रहे। वहीं गीतकार रामरतन गुमालिया, संगीतकार चितरंजन नामा, सेट डिजाइन शुभम मेघवंशी एवं आफताब नूर, प्रकाश डिजाइन मणिकांत, प्रकाश संचालन अवधेश कुमार पटेल, वेशभूषा डिजाइन राजवंती तामोली एवं आशीष चावला, प्रॉप्स डिजाइन अदनान खान एवं शादाब, एवं प्रस्तुति निर्माण में मार्गदर्शन राजकुमार रजक का रहा। इसके बाद शाम सात बजे टाऊन हाल में डॉ धर्मवीर भारती लिखित थर्ड बेल जोधपुर की प्रस्तुति नदी प्यासी थी का मंचन हुआ। जिसका निर्देशन उम्मीद सिंह भाटी ने किया। कथानक एक नदी किनारे बसे कस्बे का है जहाँ नदी में बाढ़ आयी हुई है। कस्बे की नदी के बारे में प्रचलित है कि बाढ़ आने पर उस नदी को शांत करने के लिए पशु बलि दी जाती है और जब नदी देवी के मंदिर तक चल आये, असाधारण रौद्र रूप धारण कर ले, तब कोई मानव उस नदी में अपने प्राण त्याग कर नर बलि के अंतिम उपाय को फलीभूत करता है, गोया कि नदी की प्यास मात्र रक्त ही बुझा सकता है। उसी कस्बे में रहने वाले एक व्यक्ति शंकर के यहाँ उसका लेखक मित्र राजेश आता है जो कि अवसाद एवं मानसिक घुटन के चरम पर है क्योंकि वह अपने प्रेम की विफलता की सह पाने में अपने को घोर असमर्थ महसूस करता है, इस कारण राजेश अत्यंत व्यथित एवं प्राणोत्सर्ग को उत्कंठित है। राजेश के विचार इतने संताप भरे होते हैं कि कि उसे हर एक मानव का जीवन व्यर्थ लगने लगता है। नाटक के तीनों पात्र के मन में उठते हुए ज्वार एवं बाड़ी नदी की प्यास एकाकार हो उठती है। किसकी प्यास पूरी होती है और किसकी नहीं, अंत ही प्रमाण होता है कि अपने अपने मन की नदी अपनी प्यास के कारण पात्रों से क्या करवा बैठती है। मंच पर अजय करण जोशी ,नेहा रांकावत ,नवीन रतावा ,मोहम्मद इमरान ,चारू जैन,भरत वैष्णव रहे। इससे पूर्व रंग वार्ता में लोक नाट्य और आधुनिक नाटकों में बुनियादी अंतर पर अर्जुन देव चारण, स्वाति व्यास, राघवेंद्र रावत, ईश्वर दत्त माथुर, नवल कुमार, देशराज मीणा, शिव प्रसाद ने दर्शकों से अपने विचार साझा किए।

भीलवाड़ा नाट्य महोत्सव के इसी सिलसिले में कल अंतिम दिन 10:00 नाटक नदी प्यासी थी के निर्देश उम्मीद उमेद भाटी जी के साथ चर्चा की जाएगी एवं शाम को 5:00 बजे रसधारा सभागार में नाटक जामुन का पेड़ एवं 7.30 बजे नाटक खाँचे का मंचन किया जायेगा।

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