आंमा गांव में श्मशान घाट बदहाली का शिकार, गंदगी और अव्यवस्था के बीच अंतिम संस्कार को मजबूर ग्रामीण

आंमा गांव में श्मशान घाट बदहाली का शिकार, गंदगी और अव्यवस्था के बीच अंतिम संस्कार को मजबूर ग्रामीण
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भीलवाड़ा प्रहलाद तेली। कहते हैं मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है और हर इंसान को सम्मानजनक विदाई मिलनी चाहिए, लेकिन भीलवाड़ा जिले की मांडलगढ़ विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत आंमा में यह कथन खोखला साबित हो रहा है। यहां किसी अपने की अंतिम यात्रा न केवल भावनात्मक पीड़ा देती है, बल्कि श्मशान घाट की बदहाल स्थिति परिजनों और ग्रामीणों के लिए एक बड़ी परीक्षा बन जाती है।

आंमा गांव का श्मशान घाट गंभीर अव्यवस्थाओं का शिकार है। यहां मूलभूत सुविधाओं का पूरी तरह अभाव है। सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि श्मशान में लगाए गए टीन शेड तक गायब हो चुके हैं। बारिश के मौसम में शव का दाह संस्कार करना बेहद मुश्किल हो जाता है। मजबूरी में ग्रामीण तिरपाल का सहारा लेकर, भीगते हुए अंतिम संस्कार करते हैं। न छाया है, न बैठने की कोई समुचित व्यवस्था।

श्मशान घाट तक पहुंचने वाला रास्ता कीचड़ से भरा रहता है। पास स्थित तालाब की पाल पर फैली गंदगी और वहां से उठती दुर्गंध ने हालात और भी भयावह बना दिए हैं। अंतिम संस्कार में शामिल होने आने वाले लोगों को कटीली झाड़ियों और कचरे के बीच बैठना पड़ता है। गर्मी हो या सर्दी, शोक संतप्त लोगों के लिए यहां कोई सुरक्षित या स्वच्छ स्थान उपलब्ध नहीं है।

हाल ही में आंमा निवासी गणेश लाल जरवाल के निधन पर जब गांव और आसपास के क्षेत्रों से लोग अंतिम संस्कार में पहुंचे, तो उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। श्मशान घाट की गंदगी और दुर्दशा को देखकर लोगों में गहरा रोष और नाराजगी देखने को मिली। ग्रामीणों का कहना है कि दुख की घड़ी में ऐसी अव्यवस्थाएं पीड़ा को और बढ़ा देती हैं।

ग्रामवासी एडवोकेट बालकृष्ण पुरोहित ने बताया कि श्मशान की स्थिति को लेकर कई बार प्रशासन को अवगत कराया गया, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने कहा कि अंतिम संस्कार के समय परिजनों की मानसिक स्थिति पहले ही बेहद संवेदनशील होती है, ऐसे में अव्यवस्थाएं उन्हें अंदर तक तोड़ देती हैं।

गांव के प्रबुद्ध नागरिक बालकिशन पुरोहित, सुखदेव जरवाल और राधेश्याम तेली सहित दर्जनों ग्रामीणों ने इस कुप्रबंधन पर गहरा आक्रोश जताया है। ग्रामीणों का कहना है कि श्मशान तक जाने वाला मार्ग कीचड़ और गंदगी से भरा है, वहीं टीन शेड न होने के कारण बारिश में दाह संस्कार करना बेहद कठिन हो जाता है। तालाब की पाल पर जमा गंदगी और बदबू से संक्रमण का खतरा भी बना रहता है।

ग्रामीणों का आरोप है कि सरपंच गोपाल सुवालका को भी कई बार इस गंभीर समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन धरातल पर कोई बदलाव नजर नहीं आया। हालांकि इस मामले में मांडलगढ़ विधायक गोपाल खंडेलवाल को स्थिति से अवगत कराया गया है, जिन्होंने श्मशान घाट की व्यवस्थाएं शीघ्र सुधारने और विकास कार्य करवाने का आश्वासन दिया है।

एक ओर देश डिजिटल इंडिया और स्मार्ट गांवों की बात कर रहा है, वहीं आंमा जैसे गांवों में इंसान का अंतिम सफर नारकीय हालात में पूरा हो रहा है। अब देखना यह है कि प्रशासन कब जागता है और कब आंमा के ग्रामीणों को इस बदहाली से राहत मिलती है।

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