भीलवाड़ा में आवारा कुत्तों का खतरा , सुप्रीम कोर्ट के आदेश की जमीन पर पालना नहीं

भीलवाड़ा में आवारा कुत्तों का खतरा , सुप्रीम कोर्ट के आदेश की जमीन पर पालना नहीं
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भीलवाड़ा हलचल। सुप्रीम कोर्ट ने गत वर्ष नवंबर में आवारा श्वानों के मुद्दे पर जो आदेश दिया था, उसका उद्देश्य मानवीय और जनहितकारी था। लेकिन भीलवाड़ा में इस आदेश की जमीनी हकीकत बहुत दूर नजर आ रही है। नतीजा यह है कि शहर और गाँवों में लोगों को आवारा कुत्तों के काटने का डर बना हुआ है, और अस्पतालों में श्वानों के काटने से घायल हुए मरीजों की संख्या बढ़ गई है।

हाल की घटनाएं चिंता बढ़ा रही हैं

प्रतापनगर क्षेत्र में हाल ही में एक कुत्ते ने नवजात बच्चे को मुंह में दबाने की कोशिश की, जिसे तत्काल मौके पर पहुंचे पार्षद और स्थानीय लोगों ने मुक्त कराया। वहीं, 100 फिट रोड पर भी कई लोग आवारा कुत्तों के हमले का शिकार बने। शहर की गलियों और मोहल्लों में अब भी कुत्तों के झुंड आम दृश्य बन गए हैं।

विपरीत हालात के बावजूद संसाधन उपलब्ध

विडंबना यह है कि कुत्तों को पकड़ने, बधियाकरण और सुरक्षित छोड़ने के लिए योजना और खर्च दोनों उपलब्ध हैं। एक श्वान पर खर्च करीब 1,650 रुपए आता है। सवाल पैसे का नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति और प्रशासनिक तत्परता का है। सुप्रीम कोर्ट ने 13 जनवरी को राज्यों से स्थिति रिपोर्ट मांगी है और हाईकोर्ट भी निर्देश दे चुका है। इसके बावजूद कई नगरीय निकाय 'प्रक्रिया में है' कहकर काम की संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर रहे हैं।

राज्य मानवाधिकार आयोग का हस्तक्षेप

भीलवाड़ा-बनेड़ा क्षेत्र में पिछले सप्ताह दर्जन भर बच्चे और नागरिक कुत्तों के हमले का शिकार बने। इसी को देखते हुए राज्य मानवाधिकार आयोग ने सख्ती दिखाई है। आयोग ने जोधपुर-बीकानेर के कलक्टर, नगर निगम आयुक्त और स्वायत्त शासन विभाग के शासन सचिव को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।विशेषज्ञों का कहना है कि अब केवल चेतावनी का समय खत्म हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को जमीन पर उतारना ही होगा, अन्यथा आवारा कुत्तों के हमले और प्रशासनिक अक्षमता को लेकर सवाल बार-बार उठते रहेंगे।

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