भीलवाड़ा का अनूठा 'मुर्दा': जहाँ मातम में भी बरसती है गुलाल और अर्थी पर खिलखिलाता है शहर

भीलवाड़ा का अनूठा मुर्दा: जहाँ मातम में भी बरसती है गुलाल और अर्थी पर खिलखिलाता है शहर
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भीलवाड़ा विजय गढ़वाल। अगर आप सोच रहे हैं कि होली सिर्फ धुलंडी तक सीमित है, तो आपको 'पुराने भीलवाड़ा' की गलियों में कदम रखना होगा। यहाँ सप्तमी के दिन जो नजारा दिखता है, वह पूरी दुनिया में शायद ही कहीं और देखने को मिले। एक तरफ पूरा शहर रंगों में सराबोर होता है, तो दूसरी तरफ एक 'जिंदा इंसान' की अर्थी सजाई जा रही होती है। चौंकिए मत, यह भीलवाड़ा की बरसों पुरानी वह परंपरा है जिसे देखने के लिए लोग दूर-दराज से खींचे चले आते हैं।





जिंदा युवक की अर्थी और हंसी-ठिठोली का 'जनाजा'

सप्तमी की दोपहर भारी पुलिस बल और ड्रोन्स की निगरानी के बीच पुराने भीलवाड़ा से एक अजीबोगरीब शवयात्रा निकलती है। एक तख्ते पर एक जिंदा युवक को 'मुर्दे' की तरह लेटाया जाता है। सैकड़ों लोग गुलाल उड़ाते हुए, ढोल-नगाड़ों की थाप पर इस अर्थी को कंधा देकर बाजारों से गुजरते हैं।

इस शवयात्रा की सबसे खास बात इसकी 'फब्तियां' हैं। लोग मजाकिया अंदाज में विलाप करते हैं, अश्लील और तीखी फब्तियां कसते हैं और हंसी-मजाक का ऐसा दौर चलता है कि देखने वाला अपनी हंसी न रोक पाए। इन्हीं तीखी फब्तियों के कारण इस जुलूस में महिलाओं का शामिल होना वर्जित होता है। रोमांच तब बढ़ जाता है जब 'मुर्दा' बना युवक बीच-बीच में अर्थी से उठकर भागने की कोशिश करता है, लेकिन भीड़ उसे दोबारा पकड़कर लेटा देती है।

प्रतीकात्मक दाह संस्कार: होलिका के मंगेतर की कथा

करीब 2-3 घंटे तक शहर के मुख्य बाजारों में घूमने के बाद यह शवयात्रा एक निश्चित चौराहे पर रुकती है। यहाँ अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू होती हैं। जैसे ही अर्थी को आग लगाने की बारी आती है, 'मुर्दा' छलांग लगाकर भाग खड़ा होता है और उसकी जगह एक पुतले का प्रतीकात्मक दाह संस्कार किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इस 'मुर्दे' को होलिका के मंगेतर के रूप में देखा जाता है, जो उसकी याद में यह स्वांग रचता है।

ठंडा खाना और 'औलियाँ' का अनूठा स्वाद

सप्तमी का दिन केवल 'मुर्दे की सवारी' के लिए नहीं, बल्कि शीतला माता की भक्ति के लिए भी जाना जाता है। इस दिन घरों में चूल्हा जलाना वर्जित होता है। लोग एक रात पहले ही ठंडा खाना तैयार कर लेते हैं।

प्रमुख व्यंजन: राजस्थान की मशहूर केर-सांगरी की सब्जी और मिठाइयां।

खास आकर्षण 'औलियाँ': दही, चावल और ड्राई फ्रूट्स के मिश्रण से बना खट्टा-मीठा और तीखा 'औलियाँ' इस त्यौहार की जान है। भीलवाड़ा के लोग साल भर इस व्यंजन का इंतजार करते हैं।

राजस्थान के अन्य शहरों में भले ही धुलंडी पर होली खत्म हो जाती हो, लेकिन भीलवाड़ा के लोग सप्तमी पर दोबारा होली खेलने के लिए खास तौर पर छुट्टी लेकर घर आते हैं। तो अगर आप भी रोमांच, परंपरा और स्वाद का एक साथ आनंद लेना चाहते हैं, तो भीलवाड़ा की सप्तमी आपका इंतजार कर रही है।


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