सवाल जो हिलाएंगे, खबरें जो रुलाएंगी और सोचने को मजबूर करेंगी

क्या तीन बच्चे देश की प्रगति का रास्ता हैं?
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में कहा कि प्रत्येक भारतीय परिवार को तीन बच्चे पैदा करने चाहिए। यह बयान जनसंख्या नियंत्रण नीति (2.1 प्रजनन दर) पर आधारित है, जो सभ्यता के अस्तित्व के लिए जरूरी मानी जाती है। लेकिन सवाल यह है: क्या बढ़ती जनसंख्या संसाधनों पर दबाव नहीं डालेगी? क्या यह सुझाव महिलाओं पर अनुचित दबाव डालता है? एक ओर जहां भारत जनसांख्यिकीय लाभांश का दावा करता है, वहीं पर्यावरण और बेरोजगारी जैसे मुद्दे क्या इस नीति को चुनौती नहीं देते?
आरएसएस-बीजेपी के बीच तनातनी या सिर्फ अफवाह?
मोहन भागवत ने आरएसएस और बीजेपी के बीच मतभेद की अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि दोनों संगठन एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं, लेकिन हर मुद्दे पर एकमत होना संभव नहीं। क्या यह बयान हाल के लोकसभा चुनावों के बाद उठे सवालों का जवाब है? क्या ब्रिटिश शासन से विरासत में मिली व्यवस्थाओं में बदलाव की जरूरत है, जैसा भागवत ने संकेत दिया? और अगर हां, तो क्या नवाचार सरकार और संगठन के बीच तालमेल को और मजबूत करेंगे?
नीरज सिंह हत्याकांड: 36 जख्म, 17 गोलियां और अनुत्तरित सवाल
झारखंड के नीरज सिंह हत्याकांड ने सभी को स्तब्ध कर दिया। शरीर पर 36 जख्म और पोस्टमार्टम में 17 गोलियां मिलने से कई सवाल उठते हैं। क्या यह केवल व्यक्तिगत रंजिश थी या संगठित अपराध का हिस्सा? पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर सवाल क्यों उठ रहे हैं? क्या यह घटना झारखंड में बढ़ते अपराध और राजनीतिक हिंसा की ओर इशारा करती है?
ट्रंप का 50% टैरिफ: भारत की अर्थव्यवस्था पर कितना असर?
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के सामानों पर 50% टैरिफ लागू किया, जिससे झींगा, चमड़ा, और रत्न जैसे निर्यात क्षेत्र प्रभावित होंगे। सवाल यह है कि क्या भारत इस टैरिफ का जवाब देगा? क्या यह भारत-चीन संबंधों को सुधारने की दिशा में भारत की रणनीति को प्रभावित करेगा, जैसा कि जर्मन अखबार ने दावा किया? और सबसे बड़ा सवाल: क्या भारतीय अर्थव्यवस्था इस झटके को सहन कर पाएगी?
हिंदू मुगल रानियों का अंतिम संस्कार: इतिहास के पन्नों में क्या छिपा है?
मुगल रानियों, जो हिंदू परंपराओं को अपनाकर जीती थीं, उनके अंतिम संस्कार की कहानियां आज भी उत्सुकता जगाती हैं। क्या ये रानियां मुगल शासन में सांस्कृतिक एकीकरण का प्रतीक थीं? क्या उनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया इतिहास में जानबूझकर दबाई गई? और क्या आज के भारत में ऐसी कहानियां हमें सामाजिक समरसता का पाठ पढ़ा सकती हैं?
