मातृत्व और विवाह: बदलती सोच और आधुनिक समाज का नया चेहरा, एक संतान का चलन

मातृत्व और विवाह: बदलती सोच और आधुनिक समाज का नया चेहरा, एक संतान का चलन
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भारतीय समाज में स्त्रियों की प्राथमिकताएं अब तेजी से बदल रही हैं। शिक्षा, करियर और आत्मनिर्भरता ने उन पुरानी वर्जनाओं को तोड़ दिया है, जहाँ विवाह और संतानोत्पत्ति को ही स्त्री जीवन का एकमात्र लक्ष्य माना जाता था। हालिया सर्वे और आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि अब मातृत्व और विवाह की उम्र में बड़ा बदलाव आया है।

1. देरी से मातृत्व: करियर और सेहत पहली प्राथमिकता

दिल्ली सहित देश के महानगरों में अब महिलाएं 30 की उम्र के बाद ही मां बनने का फैसला ले रही हैं। आंकड़ों के अनुसार:

* बढ़ता रुझान: 30 से 35 वर्ष की माताओं की संख्या 2005 में महज 2.7% थी, जो 2024 तक बढ़कर 8.9% हो गई है।

* कम होता रुझान: 20 से 24 साल की उम्र में मां बनने वाली महिलाओं का प्रतिशत घटकर 27.1% रह गया है।

* कारण: महिलाएं अब अपनी पढ़ाई, मनचाही नौकरी और शारीरिक स्वास्थ्य को अधिक महत्व दे रही हैं। विवाह अब उनके लिए 'अनिवार्यता' नहीं, बल्कि एक 'विकल्प' बनता जा रहा है।

2. शहरीकरण और विवाह की नई परिभाषा

एक समय था जब 30 की उम्र पार करने वाली लड़की के विवाह को असंभव माना जाता था, लेकिन आज शहरीकरण ने इस सोच को बदल दिया है।

* देरी से विवाह: अब लड़के और लड़कियां, दोनों ही 30 के बाद विवाह को प्राथमिकता दे रहे हैं।

* स्थायित्व की तलाश: विवाह के तुरंत बाद बच्चे पैदा करने के बजाय, आधुनिक जोड़े पहले एक-दूसरे को समझने और जीवनशैली में रचने-बसने के लिए समय चाहते हैं।

3. 'एक बच्चा' नीति और पालन-पोषण का खर्च

मध्यवर्ग में अब 'एक बच्चा' (Single Child) का चलन तेजी से बढ़ा है। इसके पीछे मुख्य कारण आर्थिक और व्यावहारिक हैं:

* महंगी शिक्षा और परवरिश: माता-पिता के संयुक्त वेतन का एक बड़ा हिस्सा एक बच्चे की अच्छी शिक्षा और देखभाल में ही खर्च हो जाता है।

* बदली अवधारणा: अब यह सोच खत्म हो रही है कि इकलौता बच्चा अकेला महसूस करता है। अनुभव बताते हैं कि ऐसे बच्चे अधिक अनुशासित और स्वावलंबी होते हैं। साथ ही, अब बेटा-बेटी का भेद भी मिट रहा है।

4. अतीत से वर्तमान तक का सफर

पुराने दौर में 5-6 भाई-बहन होना सामान्य था और स्त्री की शिक्षा का उद्देश्य केवल पत्र लिख पाने तक सीमित था। लेकिन 1975 (अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष) के बाद से परिदृश्य बदला:

* भ्रूण हत्या के खिलाफ संघर्ष: अल्ट्रासाउंड के दुरुपयोग और सामाजिक कुरीतियों के बावजूद लड़कियों ने अपनी काबिलियत से खुद को साबित किया।

* आत्मनिर्भरता का युग: आज सक्षम और संपन्न हो या अभावग्रस्त, हर लड़की पहले पढ़ना और कमाना चाहती है।

5. वैश्विक संकट: जनसंख्या और वृद्ध होता समाज

भारत में जहां एक बच्चा नीति व्यक्तिगत पसंद बन रही है, वहीं दुनिया के कई देश 'जनसंख्या संकट' से जूझ रहे हैं:

* चीन और जापान: सख्त नीतियों के कारण यहां युवाओं की कमी और बुजुर्गों की संख्या बढ़ गई है। चीन अब युवाओं को डेटिंग और शादी के लिए विशेष पैकेज दे रहा है।

* रूस और यूरोप: रूस में 'मदर हीरोइन' जैसी योजनाएं और नकद पुरस्कारों के बावजूद महिलाएं बच्चे पैदा करने के पक्ष में नहीं हैं।

निष्कर्ष: आधुनिक स्त्री अब खुद को 'बच्चा पैदा करने की मशीन' नहीं मानती। वह अपने सुख, स्वाधीनता और खुशियों को प्राथमिकता दे रही है। समाज में 'चाइल्ड फ्री' (Child Free) दंपत्तियों की संख्या बढ़ना इस बात का संकेत है कि अब जीवन का निर्णय परंपराएं नहीं, बल्कि व्यक्ति स्वयं ले रहा है।

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