ईरान का बड़ा फैसला: लेबनान में शांति तक पाकिस्तान में होने वाली सीजफायर वार्ता से इनकार

ईरान का बड़ा फैसला: लेबनान में शांति तक पाकिस्तान में होने वाली सीजफायर वार्ता से इनकार
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इस्लामाबाद/तेहरान। ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता में होने वाली शांति वार्ता खटाई में पड़ती नजर आ रही है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक लेबनान में इजरायली हमले नहीं रुकते और पूर्ण सीजफायर लागू नहीं होता, वह किसी भी बातचीत में शामिल नहीं होगा। ईरानी मीडिया 'फार्स न्यूज एजेंसी' ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।

फार्स न्यूज ने WSJ की रिपोर्ट को नकारा

इससे पहले अमेरिकी समाचार पत्र 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' ने दावा किया था कि ईरानी डेलिगेशन, जिसमें संसद अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची शामिल हैं, गुरुवार शाम पाकिस्तान पहुंच चुका है। हालांकि, ईरान की फार्स न्यूज ने इस खबर को 'फेक' करार दिया है। एजेंसी के अनुसार, ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने तब तक इस्लामाबाद न जाने का फैसला किया है जब तक लेबनान पर इजरायली बमबारी बंद नहीं हो जाती।

सीजफायर समझौते पर मंडराया संकट

गौरतलब है कि 7 अप्रैल को अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के लिए एक अस्थायी सीजफायर पर सहमति बनी थी। इस समझौते के तहत दोनों देशों के नेताओं को कल यानी शनिवार (11 अप्रैल) को इस्लामाबाद में आमने-सामने की चर्चा करनी थी। इसके लिए अमेरिकी डेलिगेशन (जिसमें उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और जेरेड कुशनर के शामिल होने की चर्चा है) का आज इस्लामाबाद पहुंचने का कार्यक्रम है।

लेबनान पर क्यों अड़ा है ईरान?

ईरान के इस सख्त रुख के पीछे मुख्य वजह क्षेत्रीय सुरक्षा और अपने सहयोगी 'हिजबुल्लाह' का अस्तित्व है:

रणनीतिक दबाव: हिजबुल्लाह लेबनान में ईरान का सबसे मजबूत मिलिशिया है। ईरान इसके जरिए इजरायल को चुनौती देता है।

नेटवर्क का खतरा: यदि लेबनान में इजरायली हमले जारी रहे और हिजबुल्लाह कमजोर हुआ, तो मध्य पूर्व में ईरान का 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' टूट सकता है।

10 सूत्रीय शर्तें: ईरान ने सीजफायर के लिए जो 10 शर्तें रखी हैं, उनमें क्षेत्रीय युद्ध को पूरी तरह खत्म करना (ईरान, लेबनान, यमन पर हमले रोकना) और प्रतिबंध हटाना प्रमुख है।

इधर पाकिस्तान ने इस्लामाबाद के सेरेना होटल को किले में तब्दील कर दिया है और हाई-प्रोफाइल मीटिंग के लिए दो दिन की छुट्टी घोषित की है, लेकिन ईरान की गैरमौजूदगी इस पूरी शांति प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगा रही है।

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