निःसंतान विधवा की संपत्ति पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, मायके नहीं ससुराल को ही मिलेगी संपत्ति!

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (HSA) की धारा 15(1)(b) की वैधता पर सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की, जो यह निर्धारित करती है कि निःसंतान हिंदू विधवा की बिना वसीयत वाली संपत्ति उसके पति के वारिसों (ससुराल) को मिलती है, न कि उसके मायके वालों को।
न्यायमूर्ति नागरत्ना की अहम टिप्पणी:
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की पीठ ने इस कानूनी प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा:
कन्यादान और गोत्र-दान: "हिंदू विवाह में 'कन्यादान' की अवधारणा है। इसके तहत विवाह के समय महिला का गोत्र बदलकर उसके पति के गोत्र में शामिल हो जाता है। यह परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है।"
दायित्व पति का: कोर्ट ने कहा कि शादी के बाद महिला की जिम्मेदारी उसके पति और उसके परिवार की होती है, इसलिए वह अपने भाई से भरण-पोषण का दावा नहीं करती है।
परंपरा को न तोड़ने पर ज़ोर: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह सदियों से चली आ रही इस सामाजिक संरचना को न्यायिक फैसले से तोड़ना नहीं चाहती।
विकल्प: महिला अपनी संपत्ति को वसीयत के जरिए मायके या किसी अन्य को देने के लिए स्वतंत्र है।
क्या है मौजूदा कानून?
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(1)(b) के तहत, यदि किसी निःसंतान हिंदू विधवा की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाती है, तो उसकी संपत्ति उसके पति के वारिसों को ही मिलती है। कोर्ट में कई याचिकाओं के जरिए इस प्रावधान को चुनौती दी गई है, जिसमें कोविड-19 के कारण युवा दंपति की मौत के बाद संपत्ति के बंटवारे का मामला भी शामिल है, जहां महिला की मां अपनी बेटी की संपत्ति पर हक जता रही है।
अगली सुनवाई टली:
सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा की वैधानिकता पर सुनवाई को नवंबर तक के लिए स्थगित कर दिया है और एक संपत्ति विवाद के मामले को मध्यस्थता (Mediation) के लिए भेज दिया है। कोर्ट की इस टिप्पणी से यह संकेत मिलता है कि हिंदू विवाह की परंपरा उत्तराधिकार कानून के इस प्रावधान को मजबूत आधार प्रदान करती है।
