महाभारत में विदुर का उपदेश: ये छह दोष मनुष्य की आयु को कर देते हैं कम

महाभारत में विदुर का उपदेश: ये छह दोष मनुष्य की आयु को कर देते हैं कम
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महाभारत में एक गूढ़ और विचारोत्तेजक प्रसंग आता है, जब हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र महात्मा विदुर से यह प्रश्न करते हैं कि शास्त्रों में मनुष्य की आयु सौ वर्ष बताई गई है, फिर अधिकांश लोग पूरी आयु क्यों नहीं जी पाते। इस प्रश्न के उत्तर में विदुर जीवन को क्षीण करने वाले ऐसे छह दोषों का वर्णन करते हैं, जो तलवार की तरह मनुष्य की आयु को काट देते हैं।महात्मा विदुर को यमराज का अंशावतार माना गया है। इसलिए उनके वचनों में जीवन और मृत्यु से जुड़े गहरे रहस्य छिपे हैं। विदुर बताते हैं कि ये दोष बाहर से नहीं आते, बल्कि मनुष्य के भीतर ही जन्म लेते हैं और धीरे-धीरे उसकी जीवन शक्ति को नष्ट कर देते हैं।

पहला दोष अभिमान है। जब व्यक्ति स्वयं को सबसे श्रेष्ठ समझने लगता है और दूसरों को तुच्छ मानता है, तो वह अनजाने में शत्रु पैदा कर लेता है। ऊंचा पद, धन और प्रशंसा घमंड को बढ़ाते हैं और यही अभिमान अंततः पतन का कारण बनता है।दूसरा दोष आवश्यकता से अधिक बोलना है। असंयमित वाणी व्यक्ति को विवादों में उलझा देती है। अधिक बोलने वाला न तो समाज में सम्मान पाता है और न ही विद्वानों के बीच स्वीकार किया जाता है। वाणी पर संयम न होने से जीवन में अशांति बढ़ती है।तीसरा और सबसे घातक दोष क्रोध है। शास्त्रों में क्रोध को नरक का द्वार कहा गया है। क्रोध में मनुष्य विवेक खो बैठता है और ऐसे कर्म कर बैठता है जिनका परिणाम विनाशकारी होता है। जिसने क्रोध पर विजय पा ली, वही सच्चे अर्थों में सुखी माना जाता है।चौथा दोष त्याग का अभाव है। संग्रह की लालसा मनुष्य को भीतर से खोखला कर देती है। रावण और दुर्योधन जैसे पात्रों का पतन भी इसी कारण हुआ। विदुर कहते हैं कि भोग आयु को घटाता है, जबकि त्याग जीवन को विस्तार देता है।

पांचवां दोष स्वार्थ है। स्वार्थ और लालच ही अधिकांश संघर्षों, झगड़ों और युद्धों की जड़ हैं। स्वार्थी व्यक्ति हमेशा अशांत रहता है और अपने लाभ के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है, जिससे उसका जीवन छोटा और दुखमय हो जाता है।

छठा दोष मित्रद्रोह है। मित्रों का विश्वास जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होता है। जो व्यक्ति मित्रों से विश्वासघात करता है, उसका जीवन भय, अकेलेपन और पश्चाताप से भर जाता है। ऐसा जीवन स्वयं नरक के समान हो जाता है।

विदुर बताते हैं कि ये छहों दोष आपस में जुड़े हुए हैं। अभिमान से क्रोध जन्म लेता है, क्रोध से स्वार्थ और स्वार्थ से मित्रद्रोह। यदि मनुष्य इन दोषों से स्वयं को बचा ले, तो न केवल उसकी आयु बढ़ती है, बल्कि उसका जीवन भी संतुलित, शांत और सार्थक बन जाता है।

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