घर को बनाएं स्वर्ग-सा सुंदर - संत ललित प्रभ

राजसमन्द ( राव दिलीप सिंह) राष्ट्र-संत महोपाध्याय ललितप्रभ सागर जी महाराज ने कहा कि किसी भी घर की ताकत दौलत और शौहरत नहीं, प्रेम और मोहब्बत हुआ करती है। प्रेम बिना धन और यश व्यर्थ है। जिस घर में प्रेम है वहाँ धन और यश अपने आप आ जाता है। उन्होंने कहा कि जहां सास-बहू प्रेम से रहते हैं, भाई-भाई सुबह उठकर आपस में गले लगते हैं और बेटे बड़े-बुजुर्गों को प्रणाम कर आशीर्वाद लेते हैं। वह घर धरती का जागता स्वर्ग होता है, वहीं दूसरी और भाइयों के बीच में कोर्ट केस चल रहे हैं, देराणी-जेठाणी, सास-बहू एक-दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करती समझो वह घर साक्षात नरक है। उन्होंने कहा कि अगर भाई-भाई साथ है तो इससे बढ़कर माँ-बाप का कोई पुण्य नहीं है, और माँ-बाप के जीते जी अगर भाई-भाई अलग हो गए तो इससे बढ़कर उस घर का कोई पापोदय नहीं है।
संतप्रवर रविवार को संबोधि सेवा परिषद द्वारा स्टेशन रोड स्थित प्रज्ञा विहार में आयोजित तीन दिवसीय विराट प्रवचन सत्संग माला के तीसरे दिन हजारों श्रद्धालु भाई बहनों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि
घर-परिवार की अगर सबसे बड़ी कोई संपत्ति होती है तो वो है परिवार के सब लोगों में रहने वाला प्रेम। जैसे बिना पैसे के पर्स खाली व बेकार होता है, जैसे बिना पानी की नदी व्यर्थ होती है, वैसे ही बिना प्रेम का परिवार बेकार होता है। घर को स्वर्ग बनाने की शुरुआत ही प्रेम से होती है। अगर आप चार भाई हैं और कभी ऐसी नौबत आ जाए कि या तो आपको 25 लाख का नुकसान उठाना पड़ेगा या चार भाइयों को अलग होना पड़ेगा, भरोसा कीजिए आप दुनिया के सबसे अमीर आदमी बने रहेंगे अगर आपने ये निर्णय कर लिया कि मैं 25 लाख का नुकसान उठाने तैयार हूं, पर हम चार भाई कभी आपस में जुदा नहीं होंगे। ये नुकसान नहीं, आपका लिया महान निर्णय है। जिंदगीभर आप लाभ ही लाभ में रहेंगे। बड़े-बुजुर्ग कह गए कि साथ रहो तो शक्कर भी सस्ती पड़ती है और अलग रहो तो नून भी महंगा पड़ता है।’’
राष्ट्र्संत चंद्रप्रभजी रचित प्रेरक भजन ‘आओ कुछ ऐसे काम करें, जो घर को स्वर्ग बनाएं। हम अपना फर्ज निभाएं, हम अपना फर्ज निभाएं...’ के गायन से दिव्य सत्संग का शुभारंभ करते हुए संतप्रवर ने कहा कि जिस घर में प्रेम होता है, वह घर स्वर्ग होता है और जिस घर में प्रेम नहीं होता वह घर श्मशान होता है। कब्रिस्तान में रहने वाले हजारों लोग अलग-अलग कब्रों में रहते हैं, वे आपस में गले मिलते नहीं हैं, वे एक-दूजे को देख मुस्कुराते नहीं हैं, एक-दूजे की कब्रों में जाते नहीं हैं, वे एक-दूजे के सुख-दुख में काम आते नहीं हैं। कब्रिस्तानों में कब्रें हैं और घर में कमरे हैं। एक बहु दूसरी बहु से, एक सास अपनी बहु से नहीं बोल रही है, भाई अपने भाई से नहीं बोल रहा है, तो फिर कब्रिस्तान की कब्रों में और हमारे घरों में क्या फर्क रह गया है।
बुजुर्गों की उम्र उुपर वाला नहीं घर वाले तय करते हैं
विषय की महत्ता को स्पष्ट करते हुए संत प्रवर ने कहा कि एक बार किसी ने मुझसे पूछा कि जिन लोगों के घर में माँ-बाप का स्वर्गवास वृद्धाश्रम में होता है, उन्हें सूतक कितने दिनों का लगता है? मैंने कहा- जिस दिन से उनके माँ-बाप वृद्धाश्रम गए उसी दिन से उन्हें आजीवन सूतक लग जाता है, क्योंकि उन्होंने माँ-बाप को अपने हाथों से रोटी नहीं खिलाई। बूढ़े लोगों की उम्र कितनी होगी यह उुपर वाला तय नहीं करता, यह घर के लोग तय किया करते हैं। जिस घर में बूढ़े माँ-बाप को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है, उसी का नाम नर्क है और जिस घर में बूढ़े माँ-बाप को पलकों पर बैठाया जाता है, उसी का नाम स्वर्ग है। सप्ताह में सात वार होते हैं, पर आज मैं आपको आठवां वार देता हूं और वो है- परिवार। अगर ये आठवां वार मीठा हो तो सभी सातों वार मीठे और मधुर बन जाते हैं। सभी सातों वार देवों के हुआ करते हैं, यह आठवा वार परिवार बड़े-बुजुर्गों का हुआ करता है। मकान, घर और परिवार ये तीनों एक नहीं हैं। जहां पर आदमी केवल अपने बीवी-बच्चों के साथ रहता है, उसका नाम मकान है। जहां पर आदमी अपने माता-पिता को सम्मानपूर्वक रखता है, उसका नाम घर है। और जहां भाई-बहनों को भी प्रेम और सम्मान से रखा जाता है, उसी का नाम परिवार है। अपने घर को कभी मकान बनने मत देना, बना सको तो अपने घर को परिवार बनाने का सौभाग्य हासिल करना। अगर सब कुछ खो कर भी आपने परिवार के प्रेम को बचा लिया तो समझ लो आप जीवन की बाजी जीत गए।
जिस घर में प्रेम वहां हर दिन ईद, दिवाली और होली
संतश्री ने कहा कि साल में एक बार होली-दिवाली, ईद आती है, पर जिस घर में सुबह उठकर भाई-भाई आपस में गले मिलते हैं उस घर में साल के 365 दिन ईद होती है। जहां देवरानियों-जेठानियां एक थाली में भोजन करती हैं, उस घर में साल में 365 दिन होली होती है। जिस घर में बहुएं रात को अपने बेडरूम में जाने से पहले अपनी दादी के पांव और कमर दबाने जाया करती है, वहां दिवाली साल में एक दिन नहीं होती साल के 365 दिया हुआ करती है। भगवान करे, ये ईद, दिवाली, होली जैसे पर्व हमारे घरों में हमेशा मनते रहें। अपने घरों में एक चीज की दौलत बढ़ाओ और वह है प्रेम की दौलत।
परिवार में कैसे रहें यह राम से सीखें
विषयान्तर्गत संतश्री ने आगे कहा कि रामायण और महाभारत दोनों ही राजकुल की, भाई-भाई की कहानी है, फर्क केवल इतना है कि महाभारत में भाई-भाई को लूट रहा है और रामायण में भाई-भाई को लुटा रहा है। एक त्याग की एक स्वार्थ की, एक लूटने की और एक लुटाने की कहानी है। एक आदर्शों को स्थापित करने की कहानी और एक स्वार्थभरी कहानी है। भारत में रामायण जरूर तो हो पर भूल से भी हमारे भारत में महाभारत कभी न हो। यदि किसी कारण से रिश्तों में दूरियां-दरारें आ गईं हैं तो स्वयं बी-पाॅजीटिव होकर तो देखें, कैसे आपके टूटे रिश्ते दोनों ही ओर से खुद ही जुड़ जाते हैं। परिवार में कैसे रहें यह हमें राम से सीखना चाहिए, दुनिया में कैसा जीना इसे कृष्ण से सीखना चाहिए और मुक्ति के मार्ग पर कैसे जाया जाता है, यह सीखना हो तो भगवान श्रीमहावीर से सीखो। परिवार को एक बनाए रखने के लिए रामायण को अपने जीवन का आदर्श बनाओ।
माँ-बाप उपहार में आए हुए चलते-फिरते भगवान
संतप्रवर ने कहा कि किस्मत वाले होते हैं जिनके घर में बड़े-बुजुर्गों का साया होता है। बूढ़ा पेड़ फल तो नहीं देता, छाया जरूर देता है। वे किस्मत वाले होते हैं, जिनके घरों में बुजुर्गों की छाया होती है। यह सही है कि परिवार में पत्नी भगवान दिया हुआ उपहार है, उसको खूब प्रेम दीजिए पर माँ-बाप उपहार में आए हुए भगवान हैं, उनकी खूब सेवा कीजिए। अगर संत कभी झूठ नहीं बोलते तो मैं यही कहूंगा कि वे किस्मत वाले होते हैं जिनके घर में माँ-बाप के रूप में जीते-जागते भगवान हैं।
घर को स्वर्ग बनाने करें ये संकल्प
संतश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान कर कहा कि अपने घर को स्वर्ग बनाने के लिए पहला संकल्प आप यह करें कि मैं बड़े-बुजुर्गों की साज-सम्हाल, सेवा-सुश्रुषा और उनका मांगल्य प्रतिदिन जरूर करुंगा। रास्ते में दो मिनट की लिफ्ट देने वाले को, एक गिलास पानी पिलाने वाले को हम थैंक्यू कहा करते हैं पर जिन्होंने हमें जिंदगी दी, उन्हें कितनी बार थैंक्यू कहते हैं। यदि उन्होंने आपको भगवान-भरोसे छोड़ दिया होता तो आप आज यहां नहीं किसी अनाथालय या यतीमखाने में रहे होते। जिन्होंने आपकी जिंदगी बनाई, प्लीज उनका बुढ़ापा बिगाड़ने का काम मत करना। जितना उन्होंने हमें निभाया है, उतना और उससे ज्यादा हम उन्हें निभाएं। जिन्होंने अपने माता-पिता, सास-ससुर का बुढ़ापा सुखी बनाया, उनका भी बुढ़ापा सुखी हो जाएगा। हम अपने जीवन में ऐसी महान भूमिका अदा करें जो घर को स्वर्ग बना दे।
उन्होंने कहा कि अगर आप संत नहीं बन सकते तो सद्गृहस्थ बनिए और घर को पहले स्वर्ग बनाइए। जो अपने घर-परिवार में प्रेम नहीं घोल पाया वह भला समाज में क्या प्रेम रस घोल पाएगा? जो अपने सगे भाई को ऊपर उठा न पाया। वह समाज को क्या ऊपर उठा पाएगा? मकान, घर और परिवार की नई व्याख्या देते हुए संतश्री ने कहा कि ईंट, चूने, पत्थर से मकान का निर्माण होता है, घर का नहीं। जहाँ केवल बीबी-बच्चे रहते हैं वह मकान घर है, पर जहाँ माता-पिता और भाई-बहिन भी प्रेम और आदरभाव के साथ रहते हैं वही घर परिवार कहलाता है। चुटकी लेते हुए संतश्री ने कहा कि लोग सातों वारों को धन्य करने के लिए व्रत करते हैं, अच्छा होगा वे आठवां वार श्परिवार्य को धन्य करे, सातों वार अपने आप धन्य हो जाएंगे।
सेवा के लिए लिया संन्यास - अपने जीवन का यथार्थ बताते हुए संतश्री ने कहा कि हमने वैराग्य से या मोक्ष पाने के लिए नहीं माता-पिता की सेवा के लिए संन्यास लिया है। माता-पिता ने बुढ़ापे को धन्य करने के लिए संन्यास ले लिया, बुढ़ापे में उनकी सेवा कौन करेगा, यह सोचकर ललितप्रभजी और मैं भी संन्यस्त हो गया। उन्होंने कहा कि हमने राम-लक्ष्मण को देखा नहीं, पर हम दोनों भाइयों ने राम-लक्ष्मण के आदर्श को पुनर्जीवित करने की कोशिश की है।
घर को घर नहीं मंदिर समझें - घर को मंदिर बनाने की प्रेरणा देते हुए संतश्री ने कहा जहां हम आधा-एक घंटा जाते हैं, उसे तो मंदिर मानते हैं, पर जहाँ 23 घंटे रहते हैं उस घर को मंदिर क्यों नहीं बनाते हैं। उन्होंने कहा कि घर का वातावरण ठीक नहीं होगा तो मंदिर जाने की याद आएगी पर हमने घर का वातावरण अच्छा बना लिया तो हमारा घर-परिवार ही मंदिर-तीर्थ बन जाएगा।
किसी का भी दिल न दुखाएं - संतश्री ने कहा कि घर का हर सदस्य संकल्प ले कि वह कभी किसी का दिल नहीं दुखाएगा। हम किसी के आँसू पौंछ सकते हैं तो अच्छी बात है, पर हमारी वजह से किसी की आँखों में आँसू नहीं आने चाहिए। अगर हमारे कारण माता-पिता की आँखों में आँसू आ जाए तो हमारा जन्म लेना ही बेकार हो गया। उन्होंने कहा कि हमसे धर्म-कर्म हो तो अच्छी बात है, पर ऐसा कोई काम न करें कि जिससे घर नरक बन जाए।
एक-दूसरे के काम आएं - घर को स्वर्ग बनाने के लिए संतश्री ने कहा कि घर के सभी सदस्य एक-दूसरे के काम आए। घर में सब आहूति दें। घर में काम करना यज्ञ में आहूति देने जितना पुण्यकारी है। संतश्री ने घर को स्वर्ग बनाने के सूत्र देते हुए कहा कि घर के सभी सदस्य साथ में बैठकर खाना खाएं, एक-दूसरे के यहाँ जाएं, सुख-दुरूख में साथ निभाएं, स्वार्थ को आने न दें, भाई-भाई को आगे बढ़ाएं, सास-बहू जैसे शब्दों को हटा दें। जब बहू घर आए तो समझे बेटी को गोद लिया है और बहू ससुराल जाए तो सोचे मैं माता-पिता के गोद जा रही हूँ।
राष्ट्रसंत चंद्रप्रभ जी रचित प्रेरक भजन ‘आओ कुछ ऐसे काम करें, जो घर को स्वर्ग बनाएं। हम अपना फर्ज निभाएं, हम अपना फर्ज निभाएं...’ के गायन से दिव्य सत्संग का शुभारंभ हुआ।
इससे डॉ मुनि श्री शांतिप्रिय सागर महाराज जी ने कहा कि इंसान जब इस धरती पर आता है तो अपने साथ कुछ अच्छाइयां और कुछ बुराइयां साथ लेकर आता है। उन अच्छाइयों को हम जीने की और बुराइयों को जीतने का निरंतर प्रयास करें। जो बुराइयों को जीत लेते हैं वे इंसान से भगवान बन जाया करते हैं और जो बुराइयों अपना लेते हैं वे शैतान बन जाया करते हैं। हो सकता है हम गाॅड बन पाएं कि न बन पाएं पर अपने जीवन में गुड जरूर बन जाएं। क्योंकि जो गुड बन जाता है वह एक दिन अपने-आप गाॅड भी बन जाता है। आप अपने जीवन को जैसा चाहे वैसा जी सकते हैं, आप इसे वरदान भी बना सकते हैं और चाहे तो इसे अभिशाप भी बना सकते हैं। चाहे तो इसे भाग्य और चाहे तो इसे भार भी बना सकते हैं। जीवन को क्या बनाना है, यह आपके ही हाथ में है। यदि तुम चाहते हो कि जहां तुम रहो, वहां सब तुम्हें प्यार करें, जहां तुम जाने वाले हो-वहां सब तुम्हारा इंतजार करें और जहां से तुम चले गए-वहां सब तुम्हें याद करें तो अपने जीवन का इस पहले मंत्र- नो कम्पलेंड को जीवन का मंत्र बना लो कि मैं जीवन में कभी शिकायत नहीं करुंगा। दूसरों के लिए अपने मन में शिकायतों को नहीं पालुंगा। शिकायतें छोड़ कर प्रेम और साधुवाद देने की आदत डाल दीजिए। दूसरा मंत्र है- नो क्रिटीसाइज। कभी किसी से एक-दूसरे की निंदा नहीं करूंगा। तीसरा- नो कम्पेयर। मैं किसी और से अपनी तुलना नहीं करुंगा। उस भगवान पर भरोसा करो, उसने हमें इस धरती पर भेजा है तो पूरा कम्पलीट भेजा है। जीवन में यदि ये तीन मंत्र आ गए तो हमारा जीवन खुशियों से आनंद से भर जाएगा।
समारोह का संचालन डॉ. वीरेंद्र महात्मा ने किया और परिषद सचिव कमलेश कच्छारा ने सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया। परिषद अध्यक्ष सुनील पगारिया ने सभी मेहमानों का अभिवादन और उपरणा ओढ़ाकर स्वागत किया।
कार्यक्रम में सुरेश बोहरा, बाबू लाल कोठारी, सुरेंद्र टाक, मनोरमा टाक, आशा पालीवाल, मुकेश बाबेल, मुकेश गर्ग, अचल धर्मावत, चंद्र प्रकाश सियाल, आशीष वागरेचा, कुलदीप सोनी, ललित बाफना, जितेन्द्र लड्ढा, पंकज मेहता, महावीर बोल्या, दीपक हिंगड़, हिम्मत कटारिया, अनिल बोहरा, नवीन विश्वकर्मा, सत्यनारायण पालीवाल आदि विशेष रूप से उपस्थित थे।
मीडिया प्रभारी जितेंद्र लड्ढा ने बताया की जनमानस के विशेष आग्रह पर रविवार सांय 8 बजे भी प्रज्ञा विहार में सीखें जीवन जीने की कला पर होंगे विशेष प्रवचन ।
संबोधी परिषद के भूपेंद्र चोरड़िया ने बताया की सोमवार को रात्रि 8:00 बजे केलवा के विशाल जागनाथ शिव मंदिर प्रांगण में विशेष प्रवचन सत्संग होगा।
