नेहरू युवा केन्द्र संगठन -मेरी माटी मेरा देश कार्यक्रम के तहत, स्वतंत्रता सैनानी का सम्मान

राजसमन्द (राव दिलीप)सिंह आजादी का अमृत महोत्सव प्रगतिशील भारत के 75 वर्ष पूरे होने पर यहॉं के लोगों, संस्कृति और गौरवशाली इतिहास को याद करने और जश्न मनाने के लिये भारत सरकार की और से की जाने वाली पहल मेरी माटी मेरा देश के तहत युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय, भारत सरकार के नेहरू युवा केन्द्र संगठन, राजसमंद द्वारा मिट्टी को नमन वीरों को वंदन कार्यक्रम के तहत नाथद्वारा निवासी स्वतंत्रता सैनानी चौधरी मदन मोहन सोमटीया का सुत की माला, श्रीफल, शॉल व इकलाई के द्वारा नागरिक अभिनंदन किया गया।
केन्द्र के कार्यक्रम सहायक हनवंत सिंह चौहान ने बताया कि यह महोत्सव भारत की जनता को समर्पित है। जिन्होनें न केवल भारत को उसकी विकास यात्रा को आगे लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है बल्कि उनके भीतर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भारत 2.0 को सक्रिय करने के दृष्टिकोण को सम्भव बनाने की शक्ति और क्षमता भी है, जो आत्मनिर्भर भारत की प्रेरणा से प्रेरित है। जैसा कि हम 15 अगस्त, 2023 की और बढ रहे है, आजादी का अमृत महोत्सव का उद्देश्य सहयोगात्मक अभियानों के माध्यम से इस जन आंदोलन को और प्रोत्साहित करके इस भारत एवं विश्व के विभिन्न भागों तक पहुंचाना है। प्रधानमंत्री द्वारा घोषित पंच प्रण के साथ पंक्तिबंद किये गये महत्वपूर्ण विषयों महिलायें एवं बच्चे, आदिवासी सशक्तिकरण, जल, सांस्कृतिक गौरव, पर्यावरण के लिये जीवन शैली, स्वास्थ्य और कल्याण, समावेशी विकास, आत्म निर्भर भारत और एकता।
इस अवसर पर राष्ट्रीय युवा अवार्डी प्रेमशंकर भटृ ने पंच प्रण का संकल्प करवाया। कार्यक्रम के दौरान भाजपा नगर अध्यक्ष प्रदीप काबरा, राष्ट्रीय युवा अवार्डी शंकरलाल गाडरी, राष्ट्रीय युवा स्वंयसेवक नीलेश पालीवाल, भरत पालीवाल, नारायणसिंह, आईपास डवलपमेंट फाउंडेशन के शेरसिंह राजपुरोहत, मिहीर सनाढ्य, आदित्यराज, योगेश ने भी स्वतंत्रता सैनानी सोमटीया जी का सम्मान किया।
• स्वतंत्रता सैनानी - चौधरी मदन मोहन सोमटीया
चौधरी मदन मोहन सोमटीया राजस्थान के नाथद्वारा के एक वीर स्वतंत्रता सेनानी है, जिन्होंने अपने छात्र जीवन के दौरान प्रजामंडल आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 13 मार्च 1925 को रामकृष्ण और नानकी देवी के घर जन्मे, वह मॉडर्न स्कूल के छात्र थे, जो उस समय स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए प्रसिद्ध था। 12-13 वर्ष की अल्पायु में भी वे प्रजामंडल आंदोलन के कट्टर समर्थक थे और घर-घर जाकर इसके लिए सक्रिय रूप से अभियान चलाते थे और जनजागरण करते थे। आंदोलन में भाग लेने के लिए बहुत छोटा समझे जाने के बावजूद, वह निडर होकर 21 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हो गए। उन्होंने तिरंगे के साथ एक जुलूस का नेतृत्व किया, स्वतंत्रता गीत गाए और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नारे लगाए, जिसके कारण उनकी गिरफ्तारी हुई। जमानत पर रिहा होने के बाद भी, उन्होंने अपनी भागीदारी जारी रखी और 25 अगस्त 1942 को फिर से गिरफ्तार कर लिया गया और 15 दिनों के लिए उदयपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। हालाँकि, आगामी परीक्षाओं के कारण, उनके सहित कई छात्रों को रिहा कर दिया गया। जेल अधिकारियों ने उन्हें पीटने और भूखा रखने सहित अमानवीय यातनाएँ दीं। जब वह भूख हड़ताल पर बैठे तो उन्हें बिना भोजन के एक बैरक में बंद कर दिया गया। उनकी वीरता और साहस को राजस्थान सरकार ने मान्यता दी।
