सकारात्मक सोच जीवन को बना देती है स्वर्ग सरीखा- संत ललितप्रभ

राजसमन्द (राव दिलीप सिंह) राष्ट्र-संत महोपाध्याय ललितप्रभ सागर महाराज ने कहा कि मन को शांत रखने के लिए सोच को सकारात्मक रखें। नकारात्मक सोच नरक का जाल बुनती है और सकारात्मक सोच स्वर्ग के महल बनाती है। नकारात्मकता के ‘न’ से ही नरक बनता है और सकारात्मकता के ‘स’ से ही स्वर्ग। जीवन में सहजता अपनाएँ। सहजता मन की शांति का मंत्र है। जो सहज मिले, उसे दूध की तरह स्वीकार कीजिए, जिसमें व्यर्थ की खींचतान और माथाफोड़ी हो, उसे खून समझकर त्याग दीजिए। मिज़ाज को हमेशा ठंडा रखिए। अगर कभी कुछ नुकसान हो भी जाए तो यह सोचकर टेंशन फ्री हो जाइए कि के.एफ.पी. ‘की फरक पेन्दा’, हो गया सो हो गया। अन्यथा आप राई जितनी बात का भी पहाड़ जितना टेंशन पाल बैठेंगे।
संतप्रवर शनिवार को संबोधि सेवा परिषद द्वारा स्टेशन रोड स्थित प्रज्ञा विहार में आयोजित तीन दिवसीय विराट प्रवचन सत्संग माला के दूसरे दिन हजारों श्रद्धालु भाई बहनों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पहले लोगों के मकान कच्चे होते थे पर दिल सच्चे होते थे। इसलिए पाँच-सात भाई भी साथ रह लिया करते थे, अब मकान तो बड़े हो गए पर दिल छोटे होते जा रहे हैं इसलिए दो भाई भी साथ नहीं रह पाते। उन्होंने कहा कि हमारे अंतरमन में पलने वाला ईगो, नकारात्मक सोच हमें अलग-थलग करते हैं, वहीं प्रेम, उदारता और सकारात्मकता हम सब लोगों को जोड़ती है। उन्होंने कहा कि अंगूर के ठेले पर जो अंगूर गुच्छे में रहते हैं उनकी कीमत ज्यादा होती है और जो अंगूर गुच्छे से बिखर जाते हैं उनकी कीमत कम हो जाती है और वे जल्दी खराब हो जाते हैं। संयुक्त परिवार के सौ सुख होते हैं। छोटी-मोटी दिक्कत आने पर भी सबकी जिंदगी साथ कट जाती है। साथ की तो शक्कर भी सस्ती पड़ जाती है और अलग का तो नमक भी महंगा पड़ जाता है।
राष्ट्र-संत ने कहा कि झाडू के तिनके जब तक साथ रहते हैं तब तक कचरा निकालते हैं, पर वे ही तिनके जब बिखर जाते हैं तो कचरा बन जाते हैं। हमें खरबूजे से सीख लेनी चाहिए जिसके छिलके में अलग-अलग धारियाँ नजर आए पर छिलका उतर जाने पर वो एक नजर आता है। दुनिया के सारे धर्म किसी उपवन में खिले हुए फूल की तरह हैं। जैसे उपवन में खिले अलग-अगल फूल उपवन की शोभा बढ़ाते हैं वैसे ही दुनिया के सारे धर्म मिलकर इंसान को जीने की अच्छी राह दिखाते हैं। हमें पंथ और संप्रदाय के नाम पर दूरियाँ बनाने की बजाय दिल बड़ा करना चाहिए और हर धर्म का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज में परस्पर सहयोग की भावना रखनी चाहिए। हर अमीर परिवार किसी गरीब परिवार का सहयोग करना शुरू कर दे तो दुनिया की आधी गरीबी अपने आप ही मिट जाएगी।
समाज में समानता की बात उठाते हुए संतप्रवर ने कहा कि हमें विवाह-शादी में बेहिसाब खर्चा करने की बजाय आदर्श स्थापित करते हुए सादगीपूर्वक विवाह करना चाहिए ताकि मध्यावर्गीय और नीचे तबके के लोगों को भी विवाह-शादी में लोड न हो। हमें सामाजिक समन्वय का भी प्रयास करना चाहिए और परिवार में भी परस्पर प्रेम, माधुर्य बना हुआ रहे। जब कोई अपना दूर चला जाए तो इतनी तकलीफ नहीं होती जितनी पास रहकर मन की दूरियाँ बना लेने पर होती हैं। दुनियाँ में सब कुछ रहे पर मानसिक दूरियाँ न रहें।
राष्ट्र-संत ने कहा कि हमें सरलता पूर्वक हर व्यवहार करना चाहिए। कभी किसी की आलोचना नहीं करनी चाहिए। हम हमारे धर्म की आराधना और उपासना करें, पर हमें किसी भी धर्म पर नकारात्मक टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। दुनियाँ में रहने वाले सभी धर्मों के लोग स्वयं को सकारात्मक बनाएँ आखिर हम सब का खून एक है। उन्होंने कहा कि दुनिया में कोई भी व्यक्ति न कद से बड़ा होता है ना पद से बड़ा होता है, बड़ा वही होता है जो अपना दिल बड़ा रखता है। कितने बार भी शून्य-शून्य लिख दो पर उसकी कीमत तभी होती है जब शून्य से पहले एक लिख दिया जाए। दुनिया में एक ऐसा इलेक्ट्रिशियन चाहिए जो उन दो व्यक्तियों के बीच में कनेक्शन कर सके जिनकी आपस में बोल-चाल बंद हो। ऐसा ऑप्टिशियन चाहिए जो हमारे नजरिए को सुधार सके। ऐसा चित्रकार चाहिए जो सबसे चेहरे पर मुस्कान की रेखा खींच सके। ऐसा मिस्त्री चाहिए जो दो पड़ोसियों में प्रेम का पुल बना सके। ऐसा शिक्षक चाहिए जो एक-दूजे के साथ सही ढ़ंग से जीना सीखा सके और ऐसा डॉक्टर चाहिए हमारे दिल से नफरत, ईष्र्या और वैर-विरोध को निकाल कर उसमें प्रेम-मोहब्बत, भाईचारे का ट्रांसप्लांट कर सके।
उन्होंने कहा कि व्यर्थ की लालसाओं में मत उलझिए। आवश्यकताएँ तो फकीर की भी पूरी हो जाया करती हैं, पर लालसाएँ तो सम्राटों की भी अधूरी रह जाती हैं। दिमाग में लोड मत लीजिए। हाथ में काम उतना ही लीजिए, जितना करने की क्षमता हो। आखिर थाली में उतना ही तो भोजन परोसना चाहिए, जितना हम खा सकते हों। माफी को महत्त्व दीजिए। खुद से गलती हो गई तो माफी माँग लीजिए और दूसरे से गलती हो गई तो माफ कर दीजिए। भला जब सॉरी कहने से प्रेम के पुल बन सकते हैं तो लम्बे समय तक द्वेष की दीवारों से सिर क्यों टकराया जाए?
उन्होंने कहा कि फालतू की माथाफोड़ी में हाथ मत डालिए। किसी के काम में तभी दखल दीजिए, जब आपसे पूछा जाए। अनावश्यक टोका-टोकी, टीका-टिप्पणी आपके दुश्मन बढ़ाएगी और जिसके दुश्मन जितने ज्यादा, सिरदर्द उसका उतना ही ज्यादा। हमें समझौतावादी नज़रिया अपनाना चाहिए। जैसा माहौल मिलें, उसमें ढल जाइए। गीत याद रखिए- समझौता गमों से कर लो, ज़िंदगी में गम भी मिलते हैं। पतझड़ आते ही रहते हैं, मधुबन फिर भी खिलते हैं। खुद को हँसता-मुस्कराता गुलाब का फूल बनाइए। अगर आप अपना पुराना रोना ही रोते रहेंगे तो खुद के ही काँटों में उलझकर रह जाएँगे, वहीं अगर मुस्कराने की आदत डाल लेंगे तो दूसरों के भी आँसू पोंछने में सफल हो जाएँगे।
संतप्रवर ने कहा कि ईश्वर पर भरोसा रखिए। भाग्य अगर हमारे 99 द्वार बंद कर देगा, तब भी ईश्वर हमारे लिए कोई-न-कोई एक द्वार अवश्य खोल देगा। हर रोज जोर के 10 बार खुल के मुस्कुराइए, 5 मिनट भक्ति नृत्य कीजिए और 20 मिनट ध्यान। मुस्कुराने से अवसाद दूर होगा, नृत्य करने से तन-मन में लय और संगीत पैदा होगा तथा ध्यान करने से मन आध्यात्मिक शांति, शक्ति और शुद्धि की तरफ गति करेगा।
इससे डॉ मुनि शांतिप्रिय सागर महाराज जी ने कहा कि जिंदगी जीना आसान नहीं होता, बिना संघर्ष कोई महान नहीं होता, जब तक ना पड़े हथौड़े की चोट, कोई पत्थर भी भगवान नहीं होता। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन अनमोल है। हमें इसके हर सेकंड का सदुपयोग करना चाहिए और खुद की एनर्जी खुद को पॉजिटिव और पावरफुल, परफेक्ट बनाने में लगानी चाहिए। जो खुद पर फोकस करता है एक दिन दुनिया उस पर फोकस करती है। दुनिया में दो तरह के लोग हैं कुछ इतिहास पढ़ते हैं पर महान लोग वह है जो इतिहास बनाया करते हैं। उन्होंने कहा कि जीवन को भार नहीं भाग्य समझें। इसे गुनगुनाते हुए जिएं, इसे विषाद नहीं प्रभु का प्रसाद मानकर स्वीकार करें। जीवन को रोते हुए नहीं हंसते हुए जिएं । जीवन में तीन मंत्रों को जोड़ने की प्रेरणा देते हुए कहा कि किसी के भी परेशानी का कारण ना बने। दुनिया में कुछ लोग दूसरों की जिंदगी में परेशानियां खड़ी करते हैं, कुछ लोग दूसरों की परेशानियों के समय साथ देते हैं पर महान लोग वे होते हैं जो दूसरों की परेशानियां दूर करते हैं। उन्होंने कहा कि अपनी जिंदगी में पुण्य का बैलेंस बढ़ाते जाएं। जब इंसान का पुण्य प्रबल होता है तो रंक भी राजा बन जाता है और पाप प्रबल होता है तो राजा भी रंक बन जाता है इसलिए ऐसा कोई काम ना करें जिससे पाप का बैलेंस बढ़े। ऐसे रोज काम करें जिससे पुण्य का बैलेंस बढ़ता जाए। उन्होंने कहा कि इस दुनिया में जाने से पहले कुछ कर गुजरने का लक्ष्य अवश्य बनाएं। दुनिया में लाखों लोग आते हैं लाखों लोग जाते हैं पर दुनिया उन को सलाम करती है जो दुनिया के लिए कुछ करके जाते हैं।
जब उन्होंने अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे चरणों में, है जीत तुम्हारे चरणों में और हार तुम्हारे चरणों में... भजन गाया तो सब लोग खड़े होकर झुमने लगे।
समारोह का संचालन डॉ वीरेंद्र महात्मा ने किया।
कार्यक्रम में सुरेश बोहरा, बाबू लाल कोठारी, सुरेंद्र टाक, मनोरमा टाक, आशा पालीवाल, मुकेश बाबेल, मुकेश गर्ग, अचल धर्मावत, चंद्र प्रकाश सियाल, आशीष वागरेचा, कुलदीप सोनी, ललित बाफना, जितेन्द्र लड्ढा, पंकज मेहता, महावीर बोल्या, दीपक हिंगड़, हिम्मत कटारिया, अनिल बोहरा, नवीन विश्वकर्मा, सत्यनारायण पालीवाल आदि विशेष रूप से उपस्थित थे।
प्रज्ञा विहार में शनिवार को 1 घंटे में सीखें जीवन जीने की कला पर होंगे विशेष प्रवचन सत्संग - संबोधि सेवा परिषद के भूपेंद्र चौरडिया ने बताया कि घर को कैसे बनाएं स्वर्ग और बच्चों को कैसे बनाएं संस्कारवान विषय पर रविवार को सुबह 9 बजे संत स्टेशन रोड स्थित प्रज्ञा विहार में विशेष सत्संग और प्रवचन देंगे।
