मनरेगा में सबसे बड़ा सुधार, वीबी जी राम जी से बदला ग्रामीण रोजगार का ढांचा

नई दिल्ली। विकसित भारत ग्रामीण रोजगार और आजीविका मिशन यानी वीबी जी राम जी के तहत मनरेगा व्यवस्था में बड़ा पुनर्गठन किया गया है। वर्ष 2006 में शुरू हुई इस योजना के बाद यह अब तक का सबसे व्यापक और अर्थपूर्ण सुधार माना जा रहा है। लंबे समय से मनरेगा पर बहस इसके प्रतीकात्मक महत्व तक सीमित रही, लेकिन नया बदलाव उन कमजोरियों को ध्यान में रखकर किया गया है जो लगभग बीस साल के क्रियान्वयन के दौरान सामने आईं।मनरेगा पर अब तक करीब 10 लाख करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, जिसमें से लगभग 80 प्रतिशत राशि केवल वित्त वर्ष 2015 से 2025 के बीच खर्च हुई। इतने बड़े निवेश के बावजूद अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आए। हाल के वर्षों में प्रति परिवार औसतन 44 से 50 दिन का ही रोजगार मिल पाया, जबकि कानून में 100 दिन की गारंटी है। संसद और स्थायी समितियों के समक्ष 2025 के अंत में रखे गए आंकड़ों के अनुसार पिछले तीन वित्तीय वर्षों में सिर्फ 7 से 8 प्रतिशत परिवार ही पूरे 100 दिन का रोजगार हासिल कर सके।
काम की मांग और उपलब्ध कराए गए रोजगार के बीच बढ़ता अंतर अब मनरेगा की सबसे बड़ी संरचनात्मक समस्या बन चुका है। यह समस्या संसाधनों की कमी से नहीं, बल्कि फंडिंग की अनिश्चितता से पैदा हुई। वीबी जी राम जी इसी ढांचे को बदलने की कोशिश है। रोजगार गारंटी को 100 से बढ़ाकर 125 दिन करना अहम है, लेकिन इससे भी बड़ा बदलाव फंडिंग व्यवस्था में किया गया है।
नए प्रावधानों के तहत अधिकांश राज्यों के लिए केंद्र और राज्य के बीच हिस्सेदारी 60:40 तय की गई है। वहीं पूर्वोत्तर राज्यों, हिमालयी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए 90:10 का अनुपात पहले की तरह जारी रहेगा। इसे केंद्र की जिम्मेदारी से पीछे हटना नहीं, बल्कि खर्च को अधिक पूर्वानुमेय और स्थिर बनाने की दिशा में कदम माना जा रहा है। वित्त वर्ष 2026 के लिए 86 हजार करोड़ रुपये का आवंटन अब तक का सबसे अधिक है, जो केंद्र की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
वीबी जी राम जी के अंतर्गत मनरेगा के कार्यों को चार स्पष्ट श्रेणियों तक सीमित किया गया है। इनमें जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका से जुड़ी अवसंरचना और जलवायु सहनशील परिसंपत्तियां शामिल हैं। ग्राम स्तर की योजनाओं को पीएम गति शक्ति से जोड़ा गया है ताकि काम केवल रोजगार तक सीमित न रहे, बल्कि टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण भी हो सके।
हालांकि चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। कई राज्यों में घोषित मजदूरी दर और श्रमिकों को मिलने वाले वास्तविक भुगतान में अंतर है, जिससे काम की मांग प्रभावित होती है। इसके बावजूद यह साफ है कि वीबी जी राम जी न तो पारंपरिक अर्थों में योजना का विस्तार है और न ही कटौती। यह एक संतुलन है, जो बीते बीस वर्षों के अनुभव से मिली वित्तीय और प्रशासनिक सीमाओं को स्वीकार करता है।
सरकार का जोर अब इस बात पर है कि ग्रामीण रोजगार गारंटी को अस्थायी राहत के बजाय टिकाऊ व्यवस्था बनाया जाए। रोजगार, योजना, परिसंपत्ति निर्माण और जवाबदेही को आपस में जोड़कर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है कि कल्याणकारी योजनाएं केवल खर्च तक सीमित न रहें, बल्कि प्रभावी डिलीवरी के साथ जमीन पर असर दिखाएं। इस सुधार की सफलता अंततः राज्यों और स्थानीय स्तर पर क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी, लेकिन नीति स्तर पर यह एक स्पष्ट संकेत है कि अब कल्याण को लंबे समय तक टिकने लायक बनाने की दिशा में सोच बदली जा रही है।
