मेवाड़ का 'काला सोना': खेतों में गूंजी शिव आराधना, अफीम की लुवाई-चिराई शुरू

मेवाड़ का काला सोना:    खेतों में गूंजी शिव आराधना, अफीम की लुवाई-चिराई शुरू
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मेवाड़ की धरा पर अफीम की खेती को 'काला सोना' माना जाता है और इसकी कटाई का आगाज आस्था के महापर्व महाशिवरात्रि से हो गया है। डूंगला क्षेत्र के ग्राम चिकारड़ा सहित आसपास के इलाकों में किसानों ने भगवान भोलेनाथ और शक्ति स्वरूपा काली माई की विशेष पूजा-अर्चना के साथ अफीम की फसल में लुवाई-चिराई का कार्य विधिवत रूप से शुरू कर दिया है।

किसान मदनलाल ने बताया कि यह कार्य केवल कृषि प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुष्ठान की तरह है। किसानों ने प्रथम पूज्य गणेश जी, भगवान शंकर और कालिका माता का आह्वान कर खेतों में ही देव स्थापना की। धूप-ध्यान और विशेष प्रार्थना के साथ अच्छी पैदावार और अनुकूल मौसम की कामना की गई।

सुरक्षा का कड़ा पहरा: कैमरे और नेट से हो रही रखवाली

अफीम की फसल की सुरक्षा किसी चुनौती से कम नहीं है। किसान भंवरलाल के अनुसार, फसल को पकने तक बचाने के लिए किसान पिछले दो महीनों से खेतों पर ही डेरा डाले हुए हैं।

तकनीक का सहारा: असामाजिक तत्वों पर नजर रखने के लिए खेतों में बिजली की रोशनी और सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।

जानवरों से बचाव: नीलगाय और अन्य जंगली जानवरों को रोकने के लिए लोहे की जाली व कपड़ों की बाड़ लगाई गई है।

तोतों का आतंक: अफीम के डोड़ों को तोतों से बचाने के लिए पूरे खेत के ऊपर नेट (जाली) बिछाई गई है।

क्षेत्र में अफीम की खेती का रूतबा

डूंगला क्षेत्र अफीम उत्पादन का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। अकेले इस क्षेत्र में लगभग 300 लाइसेंस हैं, वहीं आसपास के बेल्ट को मिलाकर करीब 500 लाइसेंसधारी किसान दिन-रात इस कीमती फसल की रखवाली में जुटे हैं। किसानों के लिए यह 'काला सोना' उनकी सालभर की कड़ी मेहनत और आर्थिक समृद्धि का सबसे बड़ा आधार है।

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