श्रीनाथजी की देहरी पर झुका 'बादशाह', दाढ़ी से साफ की मंदिर की सीढ़ियां

नाथद्वारा | पुष्टि मार्गीय वल्लभ संप्रदाय की प्रधान पीठ नाथद्वारा में होली के पावन अवसर पर वर्षों पुरानी 'बादशाह की सवारी' की परंपरा पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई गई। गुर्जरपुरा की बादशाह गली से निकली इस अनूठी सवारी में मुगलिया पोशाक, नकली दाढ़ी-मूंछ और आंखों में काजल लगाए बादशाह पालकी पर सवार होकर निकला। मंदिर मंडल के बैंड की मधुर स्वर लहरियों के बीच यह सवारी जब श्रीनाथजी के मंदिर पहुंची, तो अद्भुत नजारा देखने को मिला।
भक्ति का अनूठा स्वरूप
मंदिर की परिक्रमा के पश्चात बादशाह बने व्यक्ति ने अपनी दाढ़ी से सूरजपोल की नवधाभक्ति के भाव से बनी नौ सीढ़ियों को साफ किया। इस प्रतीकात्मक सेवा के बाद मंदिर के परछना विभाग के मुखिया ने बादशाह को वस्त्र और आभूषण भेंट किए। दिलचस्प बात यह रही कि परंपरा के अनुसार वहां मौजूद श्रद्धालुओं ने बादशाह को खरी-खोटी भी सुनाई, जो इस उत्सव का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है।
इतिहास और आस्था का संगम
मान्यता है कि मुगल शासक औरंगजेब जब मूर्तियों को खंडित करने की मंशा से मेवाड़ पहुंचा, तो मंदिर में प्रवेश करते ही उसकी आंखों की रोशनी चली गई। उसकी बेगम की प्रार्थना और माफी के बाद जब दृष्टि लौटी, तो पश्चाताप स्वरूप बेगम के कहने पर बादशाह ने अपनी दाढ़ी से मंदिर की सीढ़ियों पर गिरी गुलाल को साफ किया। कहा जाता है कि तभी औरंगजेब की मां ने एक बेशकीमती हीरा भेंट किया था, जो आज भी प्रभु श्रीनाथजी की चिबुक (दाढ़ी) पर सुशोभित है।
