बेटियों की जीत: अंत्योदय पखवाड़े में राधा और रुक्मा को मिला न्याय, पुश्तैनी जमीन का मिला हक

राजसमंद। राजस्थान के एक छोटे से गांव कुंडेली में जन्मीं राधा और रुक्मा दो बहनें । जब वे केवल दो और चार वर्ष की थीं, तब उनके पिता का असमय निधन हो गया। पीछे बचीं उनकी मां और एक छोटी पुश्तैनी ज़मीन, लेकिन विधवा मां की मजबूरी और समाज की बेरुखी के बीच, उनके चाचा और ताऊ ने वह ज़मीन अपने नाम कर ली।
राधा और रुक्मा बड़ी हुईं, शादी हुई, परिवार बसे, लेकिन दिल में एक टीस हमेशा बनी रही कि अपनी ज़मीन, अपने हक की टीस। कहते हैं कि सच्चाई की जड़ें भले ही धीरे बढ़ती हैं, पर जब बढ़ती हैं तो मजबूत होती जाती हैं।
इसी बीच, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा पूरे राज्य में "पंडित दीनदयाल उपाध्याय अंत्योदय संबल पखवाड़ा" शुरू किया और इसके तहत ग्राम पंचायत सांगावास तहसील देवगढ़ में शिविर लगा। इस शिविर का उद्देश्य था कि राज्य की योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना और वर्षों से उपेक्षित लोगों को न्याय दिलाना।
राधा और रुक्मा का मामला भी इसी शिविर के दौरान अधिकारियों ने निस्तारित किया। तहसील द्वारा पुराने दस्तावेज़ों की गहन जांच, गवाहों के बयानों और रिकॉर्ड के आधार पर यह प्रमाणित हुआ कि ज़मीन पर हक वास्तव में राधा और रुक्मा का है। और फिर पचास वर्षों बाद वह ऐतिहासिक दिन आया जब दोनों बहनों के नाम से पुश्तैनी भूमि का नामांतरण किया गया। यह केवल एक नामांतरण नहीं था यह दो बहनों के जीवन भर के संघर्ष, धैर्य और विश्वास की जीत थी।
आज राधा और रुक्मा न केवल ज़मीन की मालकिन हैं, बल्कि गांव की हर बेटी के लिए एक जीवंत प्रेरणा बन गई हैं। उन्होंने साबित किया कि हक की लड़ाई में उम्र, लिंग या समय कोई बाधा नहीं, केवल सरकार का सहयोग चाहिए।
