पुण्य की नाव में बैठकर हम सिद्ध बुद्ध व मुक्त बन सकते हैं : साध्वी जयदर्शिता

पुण्य की नाव में बैठकर हम सिद्ध बुद्ध व मुक्त बन सकते हैं : साध्वी जयदर्शिता
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उदयपुर, । तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ जैन मंदिर में जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्तवावधान में कला पूर्ण सूरी समुदाय की साध्वी जयदर्शिता , जिनरसा , जिनदर्शिता व जिनमुद्रा महाराज आदि ठाणा की चातुर्मास सम्पादित हो रहा है।

महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि आयड़ तीर्थ पर धर्मसभा में साध्वी जयदर्शिता ने कहा कि साधु का जीवन अनुशासनबद्ध होता है। वह धर्म अनुसार जीवन जीते हैं। जैसे बहता हुआ पानी निर्मल रहता है वैसे ही साधु विचरण करते हुए अपने पर कोई दाग नहीं लगने देते। इस दौरान यदि कोई परीषह आता भी है तो भी वे भावना उच्च रखते हैं। इससे उनके कर्मों की निर्जरा होती है, अन्यथा साधु पुण्यार्जन तो कर ही लेता है। गृहस्थ जीवन में जो एक दूसरे को समझते हैं, वे ही संयुक्त परिवार में रह सकते हैं। जो गृहस्थ दैनिक जीवन में दान देते हैं, शील पालते हैं, तप त्याग करते हैं, उनके पुण्य का बैलेंस रहने तक सुख स्वास्थ्य, धन आदि संपदा बनी रहती है। इसीलिए कहा गया है कि गृहस्थ जीवन पुण्य प्रधान है। यदि व्यक्ति का पुण्य उदय हो और वह उस पुण्य का सदुपयोग करे तो पुण्य से पुण्य बढ़ता जाता है। आगम में नौ प्रकार के पुण्य की चर्चा आती है, उनमें से नमस्कार पुण्य करने में न पैसा लगता है न टका लगता है। हम प्रभु को नमस्कार करके मन पुण्य वचन पुण्य और काय पुण्य प्राप्त कर लेते हैं। इसी पुण्य की नाव में बैठकर हम सिद्ध बुद्ध व मुक्त बन सकते हैं। भक्त प्रत्याख्यान, इंगित मरण एवं पाद मरण की चर्चा करते हुए कहा कि हम अपने मरण को भी श्रेष्ठ बना सकते हैं।

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