श्रध्दा और भक्ति पूर्वक प्रभु की भक्ति करने में तत्पर बनना चाहिए : जैनाचार्य महाराज

श्रध्दा और भक्ति पूर्वक प्रभु की भक्ति करने में तत्पर बनना चाहिए : जैनाचार्य महाराज
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उदयपुर,। मालदास स्ट्रीट स्थित आराधना भवन में जैनाचार्य श्रीमद् विजय रत्नसेन सूरीश्वर महाराज की निश्रा में बडे हर्षोल्लास के साथ चातुर्मासिक आराधना चल रही है। संघ के कोषाध्यक्ष राजेश जावरिया ने बताया कि मालदास स्ट्रीट आराधना भवन में सोमवार को नौ दिवसीय अखण्ड भाष्य जाप के साथ नौ एकासना एवं नवाह्निका महोत्सव के अंतिम दिन सरोज-फतेहसिंह खमेसरा परिवार की ओर से सत्रहभेदी पूजा का आयोजन हुआ।

सोमवार को मरुधररत्न आचार्यदेव रत्नसेनसूरी महाराज ने कहा कि नौ प्रकार के पुण्यबंध के कारणों में सर्वाधिक पूण्य की प्राप्ति नमस्कार करने से होती है। परमात्मा की कृपा इतनी अधिक है कि वे तो नमस्कार करने वाले को स्वयं का सर्वोच्च पद पदान करने को भी तैयार है, आवश्यकता है मात्र श्रद्धा और भक्ति पूर्वक के वंदन, नमन और पूजन की। जैनधर्म मात्र अहिंसा को धर्म नहीं कहता, वास्तविक धर्म तो आज्ञा के पालन में है। गृहस्थ जीवन में परमात्मा की सभी आज्ञा का पालन शक्य नहीं है अत: आज्ञापालन की भावना पूर्वक आज्ञा को बताने वाले परमात्मा और गुरु भगवंतों की पूजा-भक्ति करना । गृहस्थ का परम कर्तव्य है। उसमें होने वाली एकन्द्रिय जीवों की हिंसा में पाप का नहीं बल्कि पुण्य का ही बंध होता है। जैसे खड्डे में गिर बालक को साप से बचाने के लिए उसकी माँ बच्चे को जोर से खींचे तब यदि उसे खरोच आए, पीडा हो, वह रोने लगे तो भी माँ निर्दय नहीं कहलाती है, वैसे ही प्रभु की पूजा में होने वाली जीवों की हिंसा वास्तव में बाह्य स्तर से हिंसा होने पर भी जीवहिंसा के भाव न होने से हिंसा का पाप नहीं है। एकान्त रूप से प्रभु के प्रति भक्ति का भाव होने से पुण्य की ही प्राप्ति होती है। अत: जीवन में प्रभु और गुरु की भक्ति में उपयोग किये अपने धन को ही सफल और सार्थक मानना चाहिए। शेष जिस धन से हमने अपना और परिवारादि को पोषण किया है वह स्वार्थ भाव मूलक होने से निरर्थक है।

कोषाध्यक्ष राजेश जावरिया ने बताया 16 सितंबर से प्रतिदिन प्रात: 9.30 बजे प्रवचन होगे।

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