ग़ज़ल: मैं भी निराला...!


अभी मंजिल दूर, बाकी है सफर,

आ गई थकावट बाकी है असर।

अभी और कितनी दूर तेरा गांव,

जानम दुख रहे है अब मेरे पांव।

क्या? जख्म देखकर आएगी दया,

ये परीक्षा है आई तुझे शर्मों हया।

इम्तहानों का दौर कब तक चलेगा,

अभिभावकों से दूर बंदा ये जियेगा?

प्यार में तेरे यूँ पल-पल न मरेगा,

हाथ में जहर है मेरे नहीं पियेगा।

वालदिन ने बडे मसाइन से पाला,

मेरे लिए प्यार उनका बहुत आला।

कैसे छोड़ दूँ खिलाया जो निवाला,

छोड़ता हूँ अब तुझे मैं भी निराला।

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