कविता - राज्यसभा का पवित्र स्नान...!

कविता - राज्यसभा का पवित्र स्नान...!
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राज्यसभा का पवित्र स्नान...!

जब जनता का "मिज़ाज" बदल जाए अचानक,

वोटों की नाव डूबने लगे नया बनाओ कथानक।

नेताजी के चेहरे पर आए मुस्कान जागे अरमान,

अब चलो कर लेते हैं राज्यसभा में पवित्र स्नान!

ना रैली की धूल ना जनता की करना पड़े गुहार,

ना घर-घर जाकर हाथ जोड़ना पड़ रहें बार-बार।

बस पार्टी का हो आशीर्वाद व दिल्ली का विमान,

सीधे ही पहुँच जाते हैं राज्यसभा के घाट महान।

यहाँ कोई बोले हैं—“यह अनुभव का है सम्मान”,

तो कोई कहता—“यह राजनीति का है वरदान।”

देश की जनता मुस्कुरा के हौले-हौले कह देती है,

“ये हार का नहीं सियासत का भी नया है प्लान।”

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