शाहपुरा का फूलडोल महोत्सव:: जहां धुलंडी पर गुलाल नहीं, राम-नाम की उड़ती है सुंगध; 250 वर्षों से जारी है अनूठी परंपरा

जहां धुलंडी पर गुलाल नहीं, राम-नाम की उड़ती है सुंगध; 250 वर्षों से जारी है अनूठी परंपरा
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शाहपुरा ( मूलचंद पेसवानी )। जब समूचा देश धुलंडी के पर्व पर रंगों और गुलाल में सराबोर होता है, तब भीलवाड़ा जिले का ऐतिहासिक शाहपुरा नगर अध्यात्म और वैराग्य की चादर ओढ़ लेता है। यहाँ धुलंडी के दिन रंग नहीं खेला जाता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय का सुप्रसिद्ध 'वार्षिक फूलडोल महोत्सव' शुरू होता है। करीब ढाई शताब्दी (250 वर्ष) से चली आ रही इस महान परंपरा के तहत इस वर्ष भी छह दिवसीय महोत्सव का शंखनाद हो गया है।




रामनिवास धाम में उमड़ा आस्था का सैलाब

मंगलवार सुबह चार बजे से ही रामनिवास धाम 'राम-नाम' के जयघोष से गुंजायमान हो उठा। चारों ओर भगवाधारी संत, हाथों में माला और मुख पर राम सुमिरन—पूरा वातावरण भक्तिमय नजर आया। देश-विदेश से आए हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी से रामनिवास धाम आस्था के महासागर जैसा प्रतीत हो रहा है। महोत्सव के पहले दिन दर्शनार्थियों की लंबी कतारें लगी रहीं। विशेष रूप से स्तंभजी और आचार्यश्री के दर्शनों के लिए भक्त सुबह से ही पलक पावड़े बिछाए खड़े रहे।

मियाचंद बावड़ी से शाहपुरा तक का सफर

रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज ने संवत 1817 में भीलवाड़ा की मियाचंद बावड़ी की गुफा में कठिन तपस्या और राम-नाम का सुमिरन किया था, जहाँ से इस संप्रदाय का प्रादुर्भाव हुआ। कालांतर में शाहपुरा नरेश के विशेष आग्रह पर संवत 1826 में स्वामीजी शाहपुरा पधारे। तभी से यहाँ 'फूलडोल महोत्सव' की यह गौरवशाली परंपरा स्थायी रूप से स्थापित हुई।

अणभैवाणी की शोभायात्रा और भक्ति संगीत

शाहपुरा की धुलंडी का मुख्य आकर्षण महाप्रभु रामचरणजी महाराज की 'अणभैवाणी' की भव्य शोभायात्रा होती है, जिसके साथ ही महोत्सव का विधिवत शुभारंभ होता है। पहले दिन ग्रामीण अंचलों से आए लोक कलाकारों ने ढोलक और मंजीरों की थाप पर 'केसिया गायन' और 'लोक लहरियां' प्रस्तुत कीं। भजनों की इन धुनों ने श्रोताओं को आत्मिक आनंद से भर दिया।

रंगों से पहले राम: शीतला सप्तमी को मनेगी होली

शाहपुरा की यह विशेषता है कि यहाँ रंगों का पर्व धुलंडी पर न मनाकर शीतला सप्तमी के दिन मनाया जाता है। यहाँ की धुलंडी विश्व को यह संदेश देती है कि रंगों के उत्सव से पहले 'राम-नाम' का स्थान है। फूलडोल महोत्सव अब केवल एक धार्मिक आयोजन मात्र नहीं, बल्कि शाहपुरा की सांस्कृतिक पहचान और अटूट आस्था का वैश्विक प्रतीक बन चुका है।

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