VIDEO भीलवाड़ा की सात में से पांच पर खिलेगा कमल, एक पर कांग्रेस व एक पर निर्दलीय मारेगा बाजी

भीलवाड़ा । भीलवाड़ा की सातों विधानसभा सीटों के परिणाम 3 दिसम्बर को आयेंगे लेकिन लोगों के रूझान और चर्चाओं की माने तो भीलवाड़ा में पांच सीटों पर कमल खिलता हुआ नजर आ रहा है जबकि एक सीट कांग्रेस के खाते में जा रही है। वहीं एक सीट पर निर्दलीय के बाजी मार रहा है।
इस बार विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने किसे मत दिया, यह न तो सर्वे एजेंसियां पकड़ पाई और न ही आम राजनीति के पंडित इस बात का खुलासा कर पा रहे है कि किस सीट से कौन जीतेगा। मतदान से पहले जो दिखावा प्रत्याशियों के साथ नजर आ रहा था वह ऐन मतदान के वक्त बदल जाने की बात सामने आई है। ऐसे में जो जीतता दिख रहा था वह पिछड़ गया और जीत किसी और के हाथ जाती दिख रही है।
भीलवाड़ा विधानसभा सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला हुआ था। परिणाम तो 3 दिसम्बर को पता लगेगा लेकिन भीड़ को देखकर तो यहां निर्दलीय प्रत्याशी अशोक कोठारी के जीतने के कयास और शर्तें लग रही लेकिन वास्तविकता में कुछ और ही बात सामने आ रही है। मतदान से पहले जो स्थिति थी वह मतदान के समय बदल गई और भाजपा के परम्परागत लोगों ने मन बदलते हुए कमल पर बटन दबा दिया। इसके पीछे भीलवाड़ा में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आम सभा और कोटड़ी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सभा को बड़ा कारण माना जा रहा है। मोदी ने यह कहकर बड़ा संदेश दिया कि उनका और कोई उम्मीदवार नहीं है, उनका मात्र कमल निशान ही उम्मीदवार है। इसके बाद माहौल काफी कुछ बदला है। पहले जहां निर्दलीय प्रत्याशी के साथ कमल से जुड़े लोग थे उनका भी मन बदला और मत भी। यही वजह है कि भीलवाड़ा में कमल खिलता नजर आ रहा है। कांग्रेस प्रत्याशी ओम नराणीवाल ने भी कांग्रेस के नेताओं के बिना रात दिन एक करके मेहनत तो काफी की लेकिन परिणाम पक्ष में जाता नजर नहीं आ रहा है।
सबसे चर्चित मांडल विधानसभा सीट पर राजस्व मंत्री रामलाल जाट का मुकाबला भाजपा के उदयलाल भडाणा से सीधा हुआ है। रामलाल जाट ने मांडल विधानसभा क्षेत्र में जितने विकास के काम पांच सालों में कराए है उतने अब तक नहीं हो पाये है। उन्होंने लोगों की समस्याओं को भी सुना और निदान भी किया है। यही नहीं मुख्यमंत्री की गारंटियों के अलावा अपनी ओर से दस गारंटियां भी दी है। लेकिन कहा जाता है कि इस सीट पर हर बार परिवर्तन होता है। लोगों की चर्चाओं की माने तो इस बार भी बदलाव की बयार बह सकती है। इसके पीछे कई कारण है जो मतदान से पहले और बाद में लोगों की चर्चाओं में सामने आए है। मतदान के बाद जिस तरह से लोगों में चर्चा है उससे यह सीट भी भाजपा के खाते में जाती नजर आ रही है। लेकिन स्पष्ट रूप से यह कोई नहीं कह पा रहा है कि जाट नहीं जीतेंगे। जाट मझे हुए राजनीतिज्ञ है और उन्होंने कच्ची गोलियां नहीं खेली है।
ऐसी ही स्थिति जहाजपुर विधानसभा सीट की भी है। जहां कांग्रेस प्रत्याशी धीरज गुर्जर ने चुनाव से पहले मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए काफी प्रयास किए है। रूद्राक्ष बांटे, बड़े भोजन के आयोजन भी किये। गुर्जर लोगों के दुख दर्द में भी शामिल हुए है और पांच साल तक अपने क्षेत्र में लोगों से जुड़ाव भी रखा है लेकिन मतदान के दौरान लोगों में कुछ चर्चाएं अलग ही थी। इसके चलते भाजपा के गोपीचंद मीणा के सिर फिर सेहरा बंधने की लोग चर्चा करते हुए सुने जा रहे है। जबकि मीणा से भी लोग ज्यादा खुश नहीं है। गुर्जर ने विकास के काम भी खूब कराए है लेकिन मतदाता ने मत किस ओर डाला यह 3 तारीख को ही पता लग पाएगा। अगर गुर्जर जीतते है तो यह उनकी मेहनत होगी बाकी तो कई तरह की चर्चाएं ...।
शाहपुरा विधानसभा सीट इस बार निर्दलीय के खाते में जाती नजर आ रही है। यहां से भाजपा द्वारा निष्कासित किए गए वरिष्ठ नेता और विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने निर्दलीय चुनाव लड़ा है। मेघवाल ने चुनाव में किसी तरह की कोई कोर कसर तो नहीं छोड़ी है और उन्होंने विधायक रहते शाहपुरा विधानसभा क्षेत्र में जितने विकास के काम कराए है उसका उन्हें फायदा मिला है। शाहपुरा से कांग्रेस के नरेन्द्र कुमार रेगर और भाजपा के लालराम बैरवा दोनों ही क्षेत्र में नए खिलाड़ी है। वैसे लालाराम लम्बे समय से क्षेत्र में लोगों से तालमेल बनाए हुए है परन्तु मेघवाल की तरह लोगों से उनकी पटरी नहीं बैठी। यही वजह है कि मेघवाल के सिर सेहरा बंधता दिख रहा है।
आसीन्द विधानसभा की बात करें तो वहां भाजपा के दो गुट हो गये। एक गुट में भाजपा प्रत्याशी जब्बर सिंह तो दूसरे गुट में पार्टी छोड़कर आरएलपी में शामिल होने वाले धनराज गुर्जर के बीच वोटों का बंटवारा हुआ है। इस बंटवारे में धनराज का पलड़ा भारी लग रहा है लेकिन राजनीतिक पंडितों और लोगों की चर्चा में जीत कांग्रेस के हगामी लाल मेवाड़ा की होती नजर आ रही है। इसके पीछे भाजपा के वोटों को बंटवारा या झगड़ा मुख्य कारण माना जा रहा है। अगर मेवाड़ा जीतते है तो 30 साल बाद वहां कांग्रेस का हाथ मजबूत होगा।
चर्चा करें सहाड़ा विधानसभा सीट की तो वहां भी भाजपा का पलड़ा झुकता हुआ नजर आ रहा है यानि तराजू में पलड़ा नीचे रहता है तो जीतता है ऐसा ही गौ सेवक लादूलाल पीतलिया के प्रति नजर आ रहा है। पीतलिया पिछले दस सालों से गौ सेवा, ग्रामीणों की समस्याओं का अपने स्तर पर समाधान करने से उनका लोगों से सीधा जुड़ाव है। जबकि कांग्रेस के प्रत्याशी राजेन्द्र त्रिवेदी की छवि साफ है लेकिन अब तक के कांग्रेस राज में जिस तरह से आम लोग परेशान रहे है और समस्याओं से ग्रस्त रहे इसका नुकसान त्रिवेदी को उठाना पड़ेगा। लोगों में पिछले प्रताडऩाओं को लेकर कई तरह की चर्चाएं भी सुनने को मिली है।
मतदान के बाद जो चर्चाएं सामने आई और दिखाई दे रहा है उससे यही लगता है कि भीलवाड़ा जिले की पांच सीटोंं भीलवाड़ा, मांडल, मांडलगढ़, जहाजपुर और सहाड़ा पर कमल खिलता नजर आ रहा है। जबकि आसीन्द में कांग्रेस और शाहपुरा में निर्दलीय कैलाश मेघवाल की जीत तय मानी जा रही है। लेकिन अन्तिम परिणाम तो 3 दिसम्बर को ही पता लग पाएगा कि कौन बाजी हारता है और किसके सिर सेहरा बंधता है।
