पेंशनर्स की 'सांसें' अटका रहे स्वास्थ्य विभाग के नित नए नियम: इलाज कम, कागजी उलझनों ने बढ़ाया बुजुर्गों का बीपी
भीलवाड़ा हलचल । बुढ़ापे की लाठी और सरकार के प्रति निष्ठा का फल माने जाने वाली 'राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम' (RGHS) अब पेंशनर्स के लिए राहत के बजाय 'आफत' का सबब बनती जा रही है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा एक के बाद एक थोपे जा रहे जटिल आदेशों ने सेवानिवृत्त कर्मचारियों की रातों की नींद उड़ा दी है। आलम यह है कि सरकारी दफ्तरों में पूरी उम्र गुजारने वाले इन बुजुर्गों को अब अपने ही इलाज के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं।
पिछली पर्ची लाओ, तब इलाज पाओ: तुगलकी फरमान से आक्रोश
विभाग के हालिया आदेश ने पेंशनर्स को सकते में डाल दिया है। अब अस्पताल में नई पर्ची कटवाने से पहले पिछली दवा का बिल दिखाना अनिवार्य कर दिया गया है। विभाग शायद यह भूल गया कि 70-80 साल की उम्र में याददाश्त और कागजों को सहेजने की क्षमता कम हो जाती है। कई बार दवा दुकानदार 'सर्वर डाउन' का बहाना बनाकर बिल बाद में देने की बात कहते हैं, तो कभी बुजुर्गों से बिल मिसप्लेस हो जाता है। ऐसे में बिना बिल के उन्हें इलाज से वंचित किया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या बीमार बुजुर्ग दुकानदार से बहस करे या अपनी जान बचाए?
₹2000 की दवा के लिए 'साहब' की मंजूरी का इंतजार
परेशानी यहीं खत्म नहीं होती। विभाग ने एक और 'तीखा' आदेश जारी कर पेंशनर्स की कमर तोड़ दी है। अब यदि किसी गंभीर बीमारी की दवा का खर्च महीने में 2000 रुपए से ऊपर जाता है, तो उसके लिए प्रमुख चिकित्सा अधिकारी (PMO) से पूर्व अनुमोदन (Pre-approval) लेना अनिवार्य होगा।
पेंशनर्स का दर्द: "क्या अब हम अपनी बीमारी भी बजट देखकर तय करें? गंभीर बीमारियों में 2000 रुपए की दवा तो हफ्ते भर की होती है, ऐसे में क्या हर बार बुजुर्ग कतारों में लगकर साहब के दस्तखत का इंतजार करेंगे?"
सिस्टम की पेचीदगी में उलझता 'सम्मान'
सेवानिवृत्त कर्मियों का कहना है कि आरजीएचएस को सुलभ बनाने के बजाय इसे इतना पेचीदा बना दिया गया है कि बुजुर्ग अस्पताल जाने के नाम से कतराने लगे हैं। विभाग के इन नित बदलते नियमों से पेंशनर्स में भारी नाराजगी है। उनका साफ कहना है कि यदि इन 'कागजी बेड़ियों' को जल्द नहीं हटाया गया, तो वे सड़कों पर उतरकर विरोध दर्ज कराएंगे।
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