रेरा के 9 साल—क्या उम्मीदों पर फिरा पानी? सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने खड़े किए सवाल
रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता और घर-खरीदारों को बिल्डरों की मनमानी से बचाने के लिए बनाए गए 'रेरा' (RERA) कानून के नौ साल पूरे होने पर अब गंभीर आत्ममंथन की जरूरत महसूस की जा रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई तीखी टिप्पणी ने इस संस्था की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि रेरा को बंद कर देना ही बेहतर है, क्योंकि यह डिफाल्टर बिल्डरों के लिए ढाल और रिटायर्ड अधिकारियों का 'पुनर्वास केंद्र' बनता जा रहा है।
भरोसा या सिर्फ कागजी प्रक्रिया?
जिस कानून को 'अनुशासन' और 'भरोसा' कायम करने के लिए लाया गया था, वह अब केवल दस्तावेज अपलोड करने तक सीमित रह गया है।
अधूरी जानकारी: कई मामलों में देखा गया है कि बिल्डर के ब्रोशर में दर्ज सुविधाएं रेरा पोर्टल और स्वीकृत नक्शों से मेल नहीं खातीं। खरीदार आज भी सही जानकारी के लिए भटक रहा है।
समय सीमा का खेल: कानून के तहत प्रोजेक्ट की समय सीमा बढ़ाना (Extension) एक अपवाद होना चाहिए था, लेकिन राज्यों में यह एक आम प्रक्रिया बन गई है। देरी का खामियाजा केवल खरीदार भुगतता है, जबकि बिल्डर पर कोई सख्त आर्थिक दंड नहीं दिखता।
एकतरफा नियम: महाराष्ट्र (महारेरा) जैसे उदाहरण सामने आए हैं, जहाँ बिल्डर खरीदार पर भारी 'होल्डिंग चार्ज' थोप रहे हैं, जबकि खुद देरी करने पर बिल्डर पर ऐसा कोई ठोस 'अन-होल्डिंग चार्ज' लागू नहीं है।
तकनीक के दौर में भी निगरानी का अभाव
आज के AI और डेटा एनालिटिक्स के युग में प्राधिकरण आसानी से निर्माण की प्रगति और फंड के प्रवाह की निगरानी कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पंजीकरण के समय ही बिल्डरों की गंभीर जांच हो और नियमों को सख्ती से लागू किया जाए, तो शिकायतों की नौबत ही नहीं आएगी।
निष्कर्ष: कानून में मजबूती है, लेकिन उसे लागू करने वाले 'मजबूत इरादों' की कमी साफ झलक रही है। रेरा तभी सफल होगा जब वह सजा देने से ज्यादा, प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा कराने की सक्रिय भूमिका निभाएगा।
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