भीलवाड़ा: लग्जरी कारों के दौर में बैलगाड़ियों पर निकला मायरा, पुरानी परंपराओं की दिखी झलक
भीलवाड़ा की सड़कों पर आज एक अनोखा और सुखद नजारा देखने को मिला, जब सजी-धजी बैलगाड़ियां, मशक की धुन और कच्छी घोड़ी नृत्य के साथ एक परिवार अपनी बहन के घर मायरा भरने निकला। आधुनिकता के इस दौर में पुरानी परंपराओं को जीवित रखने का यह अनूठा प्रयास चर्चा का विषय बना हुआ है।
परंपरा और प्रेम का संगम
शहर के माणिक्य नगर (माली खेड़ा) निवासी माली परिवार के सदस्यों ने अपनी बहन के घर मायरा ले जाने के लिए लग्जरी कारों के बजाय पारंपरिक बैलगाड़ियों को चुना।
काफिला: तीन भाई कालू माली, भेरू माली और बंशी माली अपने परिवारों के साथ पांच बैलगाड़ियों पर सवार होकर निकले।
दूरी: यह काफिला माली खेड़ा से करीब 2 किलोमीटर दूर कुंवाडा रोड स्थित राधेश्याम वाटिका पहुंचा।
रौनक: बैलगाड़ियों पर मायरे का सामान लदा था, जबकि आगे-आगे लोक कलाकार मशक की धुन पर कच्छी डांस करते हुए चल रहे थे।
क्यों चुना बैलगाड़ी का सफर?
मायरा लेकर पहुंचे कालू माली ने बताया कि शादी-ब्याह की रस्में हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। पुराने समय में यातायात का साधन बैलगाड़ी ही हुआ करती थी। उन्होंने कहा:
"हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी इन पुरानी परंपराओं को सीखे और अपनाए। भाई-बहन के इस पुराने और अटूट प्यार को यादगार बनाने के लिए ही हमने भांजी की शादी में बैलगाड़ियों से जाने का निर्णय लिया।"
माली परिवार का यह काफिला जब रायला निवासी शंकर माली के यहाँ पहुँचा, तो वहां मौजूद हर शख्स इस पारंपरिक अंदाज को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया। सोशल मीडिया और सड़कों पर इस सादगी और संस्कृति के मिलन की काफी सराहना हो रही है।
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